Power of Meditation

कैसे जाग्रत करें छठी इंद्री ?

क्या है छठी इंद्री : मस्तिष्क के भीतर कपाल के नीचे एक छिद्र है, उसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं, वहीं से सुषुन्मा रीढ़ से होती हुई मूलाधार तक गई है। सुषुन्मा नाड़ी जुड़ी है सहस्रकार से। इड़ा नाड़ी शरीर के बायीं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दायीं तरफ अर्थात इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर स्थित रहता है। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः जब हमारी नाक के दोनों स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि सुषम्ना नाड़ी सक्रिय है। इस सक्रियता से ही सिक्स्थ सेंस जाग्रत होता है।इड़ा, पिंगला और सुषुन्मा के अलावा पूरे शरीर में हजारों नाड़ियाँ होती हैं। उक्त सभी नाड़ियों का शुद्धि और सशक्तिकरण सिर्फ प्राणायाम और आसनों से ही होता है। शुद्धि और सशक्तिकरण के बाद ही उक्त नाड़ियों की शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है।

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कैसे जाग्रत करें छठी इंद्री : यह इंद्री सभी में सुप्तावस्था में होती है। भृकुटी के मध्य निरंतर और नियमित ध्यान करते रहने से आज्ञाचक्र जाग्रत होने लगता है जो हमारे सिक्स्थ सेंस को बढ़ाता है। योग में त्राटक और ध्यान की कई विधियाँ बताई गई हैं। उनमें से किसी भी एक को चुनकर आप इसका अभ्यास कर सकते हैं।
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अभ्यास का स्थान : अभ्यास के लिए सर्वप्रथम जरूरी है साफ और स्वच्छ वातावरण, जहाँ फेफड़ों में ताजी हवा भरी जा सके अन्यथा आगे नहीं बढ़ा जा सकता। शहर का वातावरण कुछ भी लाभदायक नहीं है, क्योंकि उसमें शोर, धूल, धुएँ के अलावा जहरीले पदार्थ और कार्बन डॉक्साइट निरंतर आपके शरीर और मन का क्षरण करती रहती है। स्वच्छ वातावरण में सभी तरह के प्राणायाम को नियमित करना आवश्यक है।
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मौन ध्यान : भृकुटी पर ध्यान लगाकर निरंतर मध्य स्थित अँधेरे को देखते रहें और यह भी जानते रहें कि श्वास अंदर और बाहर ‍हो रही है। मौन ध्यान और साधना मन और शरीर को मजबूत तो करती ही है, मध्य स्थित जो अँधेरा है वही काले से नीला और ‍नीले से सफेद में बदलता जाता है। सभी के साथ अलग-अलग परिस्थितियाँ निर्मित हो सकती हैं। मौन से मन की क्षमता का विकास होता जाता है जिससे काल्पनिक शक्ति और आभास करने की क्षमता बढ़ती है। इसी के माध्यम से पूर्वाभास और साथ ही इससे भविष्य के गर्भ में झाँकने की क्षमता भी बढ़ती है। यही सिक्स्थ सेंस के विकास की शुरुआत है।
अंतत: हमारे पीछे कोई चल रहा है या दरवाजे पर कोई खड़ा है, इस बात का हमें आभास होता है। यही आभास होने की क्षमता हमारी छठी इंद्री के होने की सूचना है। जब यह आभास होने की क्षमता बढ़ती है तो पूर्वाभास में बदल जाती है। मन की स्थिरता और उसकी शक्ति ही छठी इंद्री के विकास में सहायक सिद्ध होती है।
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इसका लाभ : व्यक्ति में भविष्य में झाँकने की क्षमता का विकास होता है। अतीत में जाकर घटना की सच्चाई का पता लगाया जा सकता है। मीलों दूर बैठे व्यक्ति की बातें सुन सकते हैं। किसके मन में क्या विचार चल रहा है इसका शब्दश: पता लग जाता है। एक ही जगह बैठे हुए दुनिया की किसी भी जगह की जानकारी पल में ही हासिल की जा सकती है। छठी इंद्री प्राप्त व्यक्ति से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता और इसकी क्षमताओं के विकास की संभावनाएँ अनंत हैं।

योग का प्रभाव

योग का हमारे जीवन में क्या प्रभाव पड़ता है? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। आज से 50 वर्ष पूर्व योग का अध्ययन-अध्यापन ऋषियों तथा महर्षियों का विषय रहा ही माना जाता था, लेकिन योग अब आम लोगों के मानसिक और शारीरिक रोग मिटाने में लाभदाय सिद्ध हो रहा है। स्वस्थ परिवार, स्वस्थ समाज तो स्वस्थ और खुशहाल देश।

योग का नियम से और नियमित अभ्यास करने से सबसे पहले हमारे शरीर स्वस्थ बनता है। शरीर के स्वस्थ रहने से मन और मस्तिष्क भी ऊर्जावान बनते हैं। दोनों के सेहतमंद रहने से ही आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है। यह तीनों के स्वास्थ्य तालमेल से ही जीवन में खुशी और सफलता मिलती है।मान लो यदि हमारा जीवन काल 70-75 वर्ष है तो उसमें से भी शायद 20-25 वर्ष ही हमारे जीवन के कार्यशील वर्ष होंगे। उन कार्यशील वर्षों में भी यदि हम अपने स्वास्थ्य और जीवन की स्थिरता को लेकर चिंतित हैं तो फिर कार्य कब करेंगे। जबकि कर्म से ही जीवन में खुशी और सफलता मिलती है।हमें एक स्वस्थ व्यक्ति बनना होगा और इसके लिए योगाभ्यास जरूरी है। इसके द्वारा हम स्वस्थ मस्तिष्क व शरीर बनाते हैं। स्वस्थ होने पर ही हम हमारे कर्म की उपलब्धियों का सही उपयोग करते हुए अपने जीवन को स्वर्ग के समान बनाने में सफल हो सकते हैं।

वर्तमान युग : आधुनिक युग में योग का महत्व बढ़ गया है। इसके बढ़ने का कारण व्यस्तता और मन की व्यग्रता है। आधुनिक मनुष्य को आज योग की ज्यादा आवश्यकता है, जबकि मन और शरीर अत्यधिक तनाव, वायु प्रदूषण तथा भागमभाग के जीवन से रोगग्रस्त हो चला है।आधुनिक व्यथित चित्त या मन अपने केंद्र से भटक गया है। उसके अंतर्मुखी और बहिर्मुखी होने में संतुलन नहीं रहा। अधिकतर अति-बहिर्मुख जीवन जीने में ही आनंद लेते हैं जिसका परिणाम संबंधों में तनाव और अव्यवस्थित जीवनचर्या के रूप में सामने आया है।

योग का प्रभाव (effects of yoga) : योगासनों के नियमित अभ्यास से मेरूदंड सुदृढ़ बनता है, जिससे शिराओं और धमनियों को आराम मिलता है। शरीर के सभी अंग-प्रत्यंग सुचारु रूप से कार्य करते हैं। प्राणायाम द्वारा प्राणवायु शरीर के अणु-अणु तक पहुंच जाती है, जिससे अनावश्यक एवं हानिप्रद द्रव्य नष्ट होते हैं, विषांश निर्वासित होते हैं- जिससे सुखद नींद अपने समय पर अपने-आप आने लगती है। प्राणायाम और ध्यान से मस्तिष्क आम लोगों की अपेक्षा कहीं ज्यादा क्रियाशील और शक्तिशाली बनता है।योग से जहां शरीर की ऊर्जा जाग्रत होती है वहीं हमारे मस्तिष्क के अंतरिम भाग में छिपी रहस्यमय शक्तियों का उदय होता है। जीवन में सफलता के लिए शरीर की सकारात्मक ऊर्जा और मस्तिष्क की शक्ति की जरूरत होती है। यह सिर्फ योग से ही मिल सकती है अन्य किसी कसरत से नहीं।योग करते रहना का प्रभाव यह होता है कि शरीर, मन और ‍मस्तिष्क के ऊर्जावान बनने के साथ ही आपकी सोच बदलती है। सोच के बदलने से आपका जीवन भी बदलने लगता है। योग से सकारात्मक सोच का विकास होता है।

आदत बदलना जरूरी : योग द्वारा सच्चा स्वास्थ्य प्राप्त करना बिलकुल सरल है। अच्छा स्वास्थ्य हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। रोग और शोक तो केवल प्राकृतिक नियमों के उल्लंघन, अज्ञान तथा असावधानी के कारण होते हैं। खुशी और स्वास्थ्य के नियम बिलकुल सरल तथा सहज हैं। केवल अपनी कुछ गलत आदतों को बदलकर योग को अपनी आदत बनाएं।

अंतर्ध्यान शक्ति

अंतर्ध्यान शक्ति : इसे आप गायब होने की शक्ति भी कह सकते हैं। विज्ञान अभी इस तरह की शक्ति पर काम कर रहा है। हो सकता है कि आने वाले समय में व्यक्ति गायब होने की कोई तकनीकी शक्ति प्राप्त कर ले।

योग अनुसार कायागत रूप पर संयम करने से योगी अंतर्ध्यान हो जाता है। फिर कोई उक्त योगी के शब्द, स्पर्श, गंध, रूप, रस को जान नहीं सकता। संयम करने का अर्थ होता है कि काबू में करना हर उस शक्ति को जो अपन मन से उपजती है।

यदि यह कल्पना लगातार की जाए कि मैं लोगों को दिखाई नहीं दे रहा हूं तो यह संभव होने लगेगा। कल्पना यह भी की जा सकती है कि मेरा शरीर पारदर्शी कांच के समान बन गया है या उसे सूक्ष्म शरीर ने ढांक लिया है। यह धारणा की शक्ति का खेल है। भगवान शंकर कहते हैं कि कल्पना से कुछ भी हासिल किया जा सकता है। कल्पना की शक्ति को पहचाने।

जाति स्मरण का प्रयोग : इसे पूर्वजन्म ज्ञान सिद्धि योग कहते हैं जैन धर्म में इसे ‘जाति स्मरण’ कहते हैं। इसका अभ्यास करने या चित्त में स्थित संस्कारों पर संयम करने से ‘पूर्वजन्म का ज्ञान’ होने लगता है।

ऐसे जानें पूर्वजन्म को

हमारा संपूर्ण जीवन स्मृति-विस्मृति के चक्र में फंसा रहता है। उम्र के साथ स्मृति का घटना शुरू होता है, जोकि एक प्राकृति प्रक्रिया है, अगले जन्म की तैयारी के लिए। यदि मोह-माया या राग-द्वेष ज्यादा है तो समझों स्मृतियां भी मजबूत हो सकती है। व्यक्ति स्मृति मुक्त होता है तभी प्रकृति उसे दूसरा गर्भ उपलब्ध कराती है। लेकिन पिछले जन्म की सभी स्मृतियां बीज रूप में कारण शरीर के चित्त में संग्रहित रहती है। विस्मृति या भूलना इसलिए जरूरी होता है कि यह जीवन के अनेक क्लेशों से मुक्त का उपाय है।

योग में अ‍ष्टसिद्धि के अलावा अन्य 40 प्रकार की सिद्धियों का वर्णन मिलता है। उनमें से ही एक है पूर्वजन्म ज्ञान सिद्धि योग। इस योग की साधना करने से व्यक्ति को अपने अगले पिछले सारे जन्मों का ज्ञान होने लगता है। यह साधना कठिन जरूर है, लेकिन योगाभ्यासी के लिए सरल है।

कैसे जाने पूर्व जन्म को : योग कहता है कि ‍सर्व प्रथम चित्त को स्थिर करना आवश्यक है तभी इस चित्त में बीज रूप में संग्रहित पिछले जन्मों का ज्ञान हो सकेगा। चित्त में स्थित संस्कारों पर संयम करने से ही पूर्वन्म का ज्ञान होता है। चित्त को स्थिर करने के लिए सतत ध्यान क्रिया करना जरूरी है।

जाति स्मरण का प्रयोग : जब चित्त स्थिर हो जाए अर्थात मन भटकना छोड़कर एकाग्र होकर श्वासों में ही स्थिर रहने लगे, तब जाति स्मरण का प्रयोग करना चाहिए। जाति स्मरण के प्रयोग के लिए ध्यान को जारी रखते हुए आप जब भी बिस्तर पर सोने जाएं तब आंखे बंद करके उल्टे क्रम में अपनी दिनचर्या के घटनाक्रम को याद करें। जैसे सोने से पूर्व आप क्या कर रहे थे, फिर उससे पूर्व क्या कर रहे थे तब इस तरह की स्मृतियों को सुबह उठने तक ले जाएं।

दिनचर्या का क्रम सतत जारी रखते हुए ‘मेमोरी रिवर्स’ को बढ़ाते जाए। ध्यान के साथ इस जाति स्मरण का अभ्यास जारी रखने से कुछ माह बाद जहां मोमोरी पॉवर बढ़ेगा, वहीं नए-नए अनुभवों के साथ पिछले जन्म को जानने का द्वार भी खुलने लगेगा। जैन धर्म में जाति स्मरण के ज्ञान पर विस्तार से उल्लेख मिलता है।

क्यों जरूरी ध्यान : ध्यान के अभ्यास में जो पहली क्रिया सम्पन्न होती है वह भूलने की, कचरा स्मृतियों को खाली करने की होती है। जब तक मस्तिष्क कचरा ज्ञान, तर्क और स्मृतियों से खाली नहीं होगा, नीचे दबी हुई मूल प्रज्ञा जाग्रत नहीं होगी। इस प्रज्ञा के जाग्रत होने पर ही जाति स्मरण ज्ञान (पूर्व जन्मों का) होता है। तभी पूर्व जन्मों की स्मृतियां उभरती हैं।

सावधानी : सुबह और शाम का 15 से 40 मिनट का विपश्यना ध्यान करना जरूरी है। मन और मस्तिष्क में किसी भी प्रकार का विकार हो तो जाति स्मरण का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह प्रयोग किसी योग शिक्षक या गुरु से अच्‍छे से सिखकर ही करना चाहिए। सिद्धियों के अनुभव किसी आम जन के समक्ष बखान नहीं करना चाहिए। योग की किसी भी प्रकार की साधना के दौरान आहार संयम जरूरी रहता है।

मन के पार एक मन

सम्मोहन विद्या भारतवर्ष की प्राचीनतम विद्या है। इसे योग में ‘प्राण विद्या’ या ‘त्रिकालविद्या’ के नाम से जाना जाता रहा है। अंग्रेजी में इसे हिप्नटिज़म कहते हैं। विश्वभर में हिप्नटिज़म के जरिए बहुत से असाध्य रोगों का इलाज भी किया जाता रहा है। आज भी सम्मोहन सिखाने या इस विद्या के माध्यम से इलाज करने के लिए बहुत सारे केंद्र प्रमुख शहरों में संचालित हो रहे हैं।

मन को सम्मोहित करना : मन के कई स्तर होते हैं। उनमें से एक है आदिम आत्म चेतन मन। आदिम आत्म चेतन मन न तो विचार करता है और न ही निर्णय लेता है। उक्त मन का संबंध हमारे सूक्ष्म शरीर से होता है। यह मन हमें आने वाले खतरे या उक्त खतरों से बचने के तरीके बताता है। यह छटी इंद्री जैसा है या समझे की यह सूक्ष शरीर ही है। गहरी नींद में इसका आभास होता हैं।

यह मन लगातार हमारी रक्षा करता रहता है। हमें होने वाली बीमारी की यह मन छह माह पूर्व ही सूचना दे देता है और यदि हम बीमार हैं तो यह हमें स्वस्थ रखने का प्रयास करता है। बौद्धिकता और अहंकार के चलते हम उक्त मन की सुनी-अनसुनी कर देते हैं। उक्त मन को साधना ही सम्मोहन है या उक्त मन में जाग जाना ही सम्मोहन है।

मन के पार एक मन : जब आप गहरी नींद में सो जाते हैं तो यह मन सक्रिय हो जाता है। चेतन मन अर्थात जागी हुई अवस्था में सोचने और विचार करने वाला मन जब सो जाता है तब अचेतन मन जाग्रत हो जाता हैं, जिसके माध्यम से व्यक्ति या तो सपने देखता है या गहरी नींद का मजा लेता है, लेकिन व्यक्ति जब सोते हुए भी उक्त मन में जाग जाए अर्थात होशपूर्ण रहे तो यह मन के पार चेतना का दूसरे मन में प्रवेश कर जाना है, जहाँ रहकर व्यक्ति अपार शक्ति का अनुभव करता है।

यह संभव है अभ्यास से। यह बहुत सरल है, जबकि आप यह महसूस करो कि आपका शरीर सो रहा है, लेकिन आप जाग रहे हैं। इसका मतलब यह कि आप स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर गए हैं तो आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है क्योंकि इसके खतरे भी है।

मन को साधने का असर : सम्मोहन द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण (टेलीपैथिक), दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, अदृश्य वस्तु या आत्मा को देखना और दूरस्थ दृश्यों को जाना जा सकता है। इसके सधने से व्यक्ति को बीमारी या रोग के होने का पूर्वाभास हो जाता है।

कैसे साधें इस मन को : प्राणायम से साधे प्रत्याहार को और प्रत्याहार से धारणा को। इसको साधने के लिए त्राटक भी कर सकते हैं त्राटक भी कई प्रकार से किया जाता है। ध्यान, प्राणायाम और नेत्र त्राटक द्वारा सम्मोहन की शक्ति को जगाया जा सकता है। त्राटक उपासना को हठयोग में दिव्य साधना से संबोधित किया गया है। उक्त मन को सहज रूप से भी साधा जा सकता है। इसके लिए आप प्रतिदिन सुबह और शाम को प्राणायाम के साथ ध्यान करें।

अन्य तरीके : कुछ लोग अँगूठे को आँखों की सीध में रखकर तो, कुछ लोग स्पाइरल (सम्मोहन चक्र), कुछ लोग घड़ी के पेंडुलम को हिलाते हुए, कुछ लोग लाल बल्ब को एकटक देखते हुए और कुछ लोग मोमबत्ती को एकटक देखते हुए भी उक्त साधना को करते हैं, लेकिन यह कितना सही है यह हम नहीं जानते।

आप उक्त साधना के बारे में जानकारी प्राप्त कर किसी योग्य गुरु के सान्निध्य में ही साधना करें।

तेज दिमाग के लिए ध्यान

वर्तमान में ध्यान की आवश्यकता बढ़ गई है। व्यग्र और बैचेन मन के चलते जहाँ व्यक्ति मानसिक तनाव से घिरा रहता हैं वहीं यह मौसमी और अन्य गंभीर रोगों की चपेट में भी आ जाता है। दवाई से कुछ हद तक रोग का निदान हो जाता है, लेकिन जीवनभर कमजोरी रह जाती है। ध्यान दवा, दुआ और टॉनिक तीनों का काम करता है।

ध्यान का अर्थ : ध्यान का अर्थ ध्यान देना, हर उस बात पर जो हमारे जीवन से जुड़ी है। शरीर पर, मन पर और आस-पास जो भी घटित हो रहा है उस पर। विचारों के क्रिया-कलापों पर और भावों पर। इस ध्यान देने के जरा से प्रयास से ही चित्त स्थिर होकर शांत होता है तथा जागरूकता बढ़ती। वर्तमान में जीने से ही जागरूकता जन्मती है। भविष्य की कल्पनाओं और अतीत के सुख-दुख में जीना ध्यान विरूद्ध है।

ध्यान की शुरुआती विधि : प्रारंभ में सिद्धासन में बैठकर आँखें बंद कर लें और दाएँ हाथ को दाएँ घुटने पर तथा बाएँ हाथ को बाएँ घुटने पर रखकर, रीढ़ सीधी रखते हुए गहरी श्वास लें और छोड़े। सिर्फ पाँच मिनट श्वासों के इस आवागमन पर ध्यान दें कि कैसे यह श्वास भीतर कहाँ तक जाती है और फिर कैसे यह श्वास बाहर कहाँ तक आती है।

ध्यान की अवधि : उपरोक्त ध्यान विधि को नियमित 30 दिनों तक करते रहें। 30 दिनों बाद इसकी समय अवधि 5 मिनट से बढ़ाकर अगले 30 दिनों के लिए 10 मिनट और फिर अगले 30 दिनों के लिए 20 मिनट कर दें। शक्ति को संवरक्षित करने के लिए 90 दिन काफी है। इससे जारी रखें।

सावधानी : ध्यान किसी स्वच्छ और शांत वातावरण में करें। ध्यान करते वक्त सोना मना है। ध्यान करते वक्त सोचना बहुत होता है। लेकिन यह सोचने पर कि ‘मैं क्यों सोच रहा हूँ’ कुछ देर के लिए सोच रुक जाती है। सिर्फ श्वास पर ही ध्यान दें और संकल्प कर लें कि 20 मिनट के लिए मैं अपने दिमाग को शून्य कर देना चाहता हूँ।

ध्यान के लाभ : जो व्यक्ति ध्यान करना शुरू करते हैं, वह शांत होने लगते हैं। यह शांति ही मन और शरीर को मजबूती प्रदान करती है। ध्यान आपके होश पर से भावना और विचारों के बादल को हटाकर शुद्ध रूप से आपको वर्तमान में खड़ा कर देता है।

ध्यान से ब्लडप्रेशर, घबराहट, हार्टअटैक जै‍सी बीमारियों पर कंट्रोल किया जा सकता है। ध्यान से सभी तरह के मानसिक रोग, टेंशन और डिप्रेशन दूर होते हैं। ध्यान से रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता हैं। स्मृति दोष में लाभ मिलता है। तेज और एकाग्र दिमाग के लिए ध्यान करना एक उत्तम और कारगर उपाय है। ध्यान से आँखों को राहत मिलती है जिससे उसकी देखने की क्षमता का विकास होता है।

योग और भूत-प्रेत

पहले ब्रिटेन में योग को हिंदुओं का विज्ञान कहकर ईसाइयों को योग से दूर रहने की हिदायत दी गई थी। फिर मलेशिया की शीर्ष इस्लामिक परिषद ने योग के खिलाफ फतवा जारी कर मुसलमानों को इससे दूर रहने को कहा और अब अमेरिका में योग के खिलाफ ईसाई धर्मगुरुओं ने आवाज उठाई है।

अमेरिका के एक पादरी ने यह कहकर नई बहस छेड़ दी है कि योग ईसाई धर्म के खिलाफ है। मार्स हिल चर्च के मार्क ड्रिस्कोल ने इस साल की शुरुआत में कहा था कि योग अभ्यास की जड़ें भूत-प्रेतों की दुनिया तक फैली हैं, जिसे ‘पूर्णत: मूर्तिपूजा’ करार दिया जा सकता है।

ड्रिस्कोल के हवाले से एक अखबार ने कहा कि क्या ईसाई धर्म के अनुयायियों को योग से इसलिए दूर रहना चाहिए क्योंकि इसकी जड़ें भूत-प्रेत तक जाती हैं? बिलकुल। योग भूत-प्रेतों से जुड़ा है। अगर आप योग कक्षाओं में जाना शुरू कर रहे हैं तो इसका तात्पर्य है कि आप भूत-प्रेत से जुड़ी कक्षाओं में जा रहे हैं।

पादरी के समर्थन में साउथन बैपटिस्ट थिओलोजिकल सेमिनरी के अध्यक्ष आर. अलबर्ट मोहलर जूनियर ने कहा कि योग ईसाई धर्म के विपरीत है।

अब सवाल यह उठता है कि स्वस्थ रहने के अभ्यास या कसरत करने से कोई कैसे भूत-प्रेत से जुड़ सकता है और समझ में नहीं आता कि इसे ‍कैसे ‘पूर्णत: मूर्तिपूजा’ करार दिया जा सकता है? उक्त वक्तव्य से लगता है कि यह योग को जाने बगैर दिया गया बयान है या फिर योग के प्रचार-प्रसार से पादरी डर गए हैं।

यह बात ऐसी ही है कि मैं आपसे कहूँ कि आयुर्वेदिक दवा खाने से आप भारतीय या हिंदू बन सकते हैं या आयुर्वेद की जड़ें भूत-प्रेतों की दुनिया तक फैली हैं।

लगभग चार हजार ईसा पूर्व जब योग का जन्म हो रहा था तब मानव जाति के मन में यह खयाल ही नहीं था कि कौन हिंदू, कौन बौद्ध, कौन ईसाई और कौन मुसलमान। योग के ईश्वर की बात करें तो वह जगत का कर्ता-धर्ता, संहर्ता या नियंता नहीं है। जब वह ऐसा नहीं है तो उसकी मूर्ति बनाकर उसे पूजना गुनाह है।

अब सवाल कि योग अभ्यास की जड़ें भूत-प्रेतों की दुनिया तक फैली हैं ऐसा ईसाई पादरी का कहना है तो जरा यह भी जान लें की योग की जड़ें क्या हैं।

योग- इस शब्द का अर्थ होता है जोड़ और जोड़ना। क्या जोड़, क्या जोड़ना? स्वयं को स्वयं से जोड़ और स्वयं को प्रकृति-ईश्वर से जोड़ना ही योग का लक्ष्य है। योगाभ्यास की जड़ है यम और नियम। दुनिया के सारे धर्म यम और नियम पर ही टिके हैं और यही योग की जड़ है।

यम पाँच हैं- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। नियम भी पाँच होते हैं- शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान। अब आप बताएँ ये यम-नियम कैसे भूत प्रेत की दुनिया तक फैले हैं? यम, नियम के बाद ही आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान का नंबर आता है। क्या आसन और प्राणायाम द्वारा शारीर को स्वस्थ्य रखने से कोई भूतों से जुड़ जाएगा?

ईसाई पादरी ने सही कहा कि जरा यह भी जान लें की योग की जड़ें क्या हैं। हम भी कहते हैं कि योग की जड़ें जाने बगैर योग ना करें वर्ना भूत-प्रेत आपको परेशान कर सकते हैं क्योंकि योग तो ऐसा अभ्यास है जो दवा का काम भी करता है और दुआ का भी

योग विशुद्ध रूप से शरीर और मन का विज्ञान है। योग के दर्शन को हिंदू ही नहीं दुनिया के प्रत्येक धर्म ने अपनाया है। ध्यान और योग का कोई धर्म नहीं। दोनों ही धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक हैं, जिसके माध्यम से शरीर और मस्तिष्क को पूर्ण स्वस्थ्य रखा जाता है।

योग के माध्यम से आज दुनिया के लाखों लोग शारीरिक और मानसिक बीमारियों से छुटकारा पाकर स्वस्थ होकर अपना जीवन खुशी से जी रहे हैं। सभी जानते हैं कि धर्म का धंधा तो दुख, भय और लालच पर ही खड़ा है।

खुली आँखों से लो नींद

आँखें खुली हों, लेकिन आप देख नहीं सकते। ऐसी स्थिति जब सध जाती है तो उसे शाम्भवी मुद्रा कहते हैं। ऐसी स्थिति में आप नींद का मजा भी ले सकते हैं। यह बहुत कठिन साधना है। इसके ठीक उल्टा कि जब आँखें बंद हो तब आप देख सकते हैं यह भी बहुत कठिन साधना है, लेकिन यह दोनों ही संभव है। असंभव कुछ भी नहीं। बहुत से ऐसे पशु और पक्षी हैं जो आँखे खोलकर ही सोते हैं।

विधि- यदि आपने त्राटक किया है या आप त्राटक के बारे में जानते हैं तो आप इस मुद्रा को कर सकते हैं। सर्वप्रथम सिद्धासन में बैठकर रीढ़-गर्दन सीधी रखते हुए पलकों को बिना झपकाएँ देखते रहें, लेकिन ध्यान किसी भी चीज को देखने पर ना रखें। दिमाग बिल्कुल भीतर कहीं लगा हो।

सलाह- शाम्भवी मुद्रा पूरी तरह से तभी सिद्ध हो सकती है जब आपकी आँखें खुली हों, पर वे किसी भी चीज को न देख रही हो। ऐसा समझें की आप किसी धून में जी रहे हों। आपको खयाल होगा कि कभी-कभी आप कहीं भी देख रहें होते हैं, लेकिन आपका ध्यान कहीं ओर रहता है।

अवधि- इस मुद्रा को शुरुआत में जितनी देर हो सके करें और बाद में धीरे-धीरे इसका अभ्यास बढ़ाते जाएँ।

लाभ- शाम्भव मुद्रा को करने से दिल और दिमाग को शांति मिलती है। योगी का ध्यान दिल में स्थिर होने लगता है। आँखें खुली रखकर भी व्यक्ति नींद और ध्यान का आनंद ले सकता है। इसके सधने से व्यक्ति भूत और भविष्य का ज्ञाता बन सकता है।

गायब होने की सिद्धि

अंतर्ध्यान शक्ति : इसे आप गायब होने की शक्ति भी कह सकते हैं। विज्ञान अभी इस तरह की शक्ति पर काम कर रहा है। हो सकता है कि आने वाले समय में व्यक्ति गायब होने की कोई तकनीकी शक्ति प्राप्त कर ले।

योग अनुसार कायागत रूप पर संयम करने से योगी अंतर्ध्यान हो जाता है। फिर कोई उक्त योगी के शब्द, स्पर्श, गंध, रूप, रस को जान नहीं सकता। संयम करने का अर्थ होता है कि काबू में करना हर उस शक्ति को जो अपन मन से उपजती है।

यदि यह कल्पना लगातार की जाए कि मैं लोगों को दिखाई नहीं दे रहा हूं तो यह संभव होने लगेगा। कल्पना यह भी की जा सकती है कि मेरा शरीर पारदर्शी कांच के समान बन गया है या उसे सूक्ष्म शरीर ने ढांक लिया है। यह धारणा की शक्ति का खेल है। भगवान शंकर कहते हैं कि कल्पना से कुछ भी हासिल किया जा सकता है। कल्पना की शक्ति को पहचाने।

आत्मबल की शक्ति

आत्मबल की शक्ति : योग साधना करें या जीवन का और कोई कर्म आत्मल की शक्ति या कहें की मानसिक शक्ति का सुदृढ़ होना जरूरी है तभी हर कार्य में आसानी से सफलता मिल सकती है। यम-नियम के अलावा मैत्री, मुदिता, करुणा और उपेक्षा आदि पर संयम करने से आत्मबल की शक्ति प्राप्त होती है।

बलशाली शरीर : आसनों के करने से शरीर तो पुष्ट होता ही है साथ ही प्राणायाम के अभ्यास से वह बलशाली बनता है। बल में संयम करने से व्यक्ति बलशाली हो जाता है।

बलशाली अर्थात जैसे भी बल की कामना करें वैसा बल उस वक्त प्राप्त हो जाता है। जैसे कि उसे हाथीबल की आवश्यकता है तो वह प्राप्त हो जाएगा। योग के आसन करते करते यह शक्ति प्राप्त होती है। सोच से संचालित होने वाली इस शक्ति को बल संयम कहते हैं।

दिव्य श्रवण शक्ति

दिव्य श्रवण शक्ति : समस्त स्रोत और शब्दों को आकाश ग्रहण कर लेता है, वे सारी ध्वनियां आकाश में विद्यमान हैं। आकाश से ही हमारे रेडियो या टेलीविजन यह शब्द पकड़ कर उसे पुन: प्रसारित करते हैं। कर्ण-इंद्रियां और आकाश के संबंध पर संयम करने से योगी दिव्यश्रवण को प्राप्त होता है।

अर्थात यदि हम लगातार ध्‍यान करते हुए अपने आसपास की ध्वनि को सुनने की क्षमता बढ़ाते जाएं और सूक्ष्म आयाम की ध्वनियों को सुनने का प्रयास करें तो योग और टेलीपैथिक विद्या द्वारा यह सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

दिव्य श्रवण शक्ति योग से हम दूर से दूर, पास से पास और धीमी से धीमी आवाज को आसानी से सुन और समझ पाते हैं। वह ध्वनि या आवाज किसी भी पशु, पक्षी या अन्य भाषी लोगों की हो, तो भी हम उसके अर्थ निकालने में सक्षम हो सकते हैं। अर्थात हम पशु-पाक्षियों की भाषा भी समझ सकते हैं।

हमारे कानों की क्षमता अपार है, लेकिन हम सिर्फ वही सुन पाते हैं जो हमारे आस-पास घटित हो रहा है या दूर से जिसकी आवाज जोर से आ रही है। अर्थात ना तो हम कम से कम आवाज को सुन पाते हैं और ना ही अत्यधिक तेज आवाज को सहन कर पाते हैं।

दूसरी बात कि हम जो भी सुन रहे हैं यदि वह हमारी भाषा से मेल खाता है तो ही हम उसे या उसके अर्थ को समझ पाते हैं, जैसे यदि आपको तमिल नहीं आती है तो आपके लिए उनका भाषण सिर्फ एक ध्वनि मात्र है। दूसरी ओर ब्रह्मांड से धरती पर बहुत सारी आवाजें आती हैं, लेकिन हमारा कान उन्हें नहीं सुन पाता।

॥श्रोत्राकाशयो: संबन्धंसंयमाद्दिव्य सोत्रम्॥3/40॥
समस्त स्रोत और शब्दों को आकाश ग्रहण कर लेता है, वे सारी ध्वनियां आकाश में विद्यमान हैं। कर्ण-इंद्रियां और आकाश के संबंध पर संयम करने से योगी दिव्य श्रवण को प्राप्त होता है

कानों पर संयम : आकाश को समझे जो सभी तरह की ध्वनि को ग्रहण करने की क्षमता रखता है। आपका मन आकाश की भांति होना चाहिए। कानों पर संयम करने से साधक को दिव्य श्रवण की शक्ति प्राप्त होती है। जाग्रत अवस्था में कानों को स्वत: ही बंद करने की क्षमता व्यक्ति के पास नहीं है। जब व्यक्ति सो जाता है तभी उसके कान बाहरी आवाजों के प्रति शून्य हो जाते हैं।

इससे यह सिद्ध हुआ की कान भी स्वत: बंद हो जाते हैं, लेकिन इन्हें जानबूझकर बगैर कानों में अंगुली डाले बंद कर बाहरी आवाज के प्रति ध्वनि शून्य कर देना ही कानों पर संयम करना है। कानों पर संयम करने से ही व्यक्ति दिव्य श्रवण की शक्ति को प्राप्त कर सकता है।

कैसे होगा कानों पर संयम : धारणा और ध्यान के माध्यम से कानों पर संयम प्राप्त किया जा सकता है। धारणा से चित्त में एकाग्रता आती है और ध्यान से पांचों इंद्रियों में संयम प्राप्त होता है। श्रवण क्षमता बढ़ाने के लिए ध्यान से सुनने पर ध्यान देना चाहिए। कहने या बोलने से ज्यादा सुनना महत्वपूर्ण होता है। श्रवणों का धर्म मानता है कि सुनने से ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

सीधा सा योग सूत्र है कि जब तक आप बोल रहे हैं तब तक दूसरों की नहीं सुन सकते। मन के बंद करने से ही दूसरों के मन सुनाई देंगे।

शुरुआत : किसी सुगंधित वातावण में मौन ध्यान के साथ अच्छा संगीत सुनने का अभ्यास करें। रात में मन को ज्यादा से ज्यादा शांत रखकर दूर से आ रही ध्वनि या पास के किसी झिंगुर की आवाज पर चित्त को एकाग्र करें। आवाजों का विश्लेषण करना सिखें। हमारे आस-पास असंख्‍य आवाजों का जाल बिछा हुआ है, लेकिन उनमें से हम 20 से 30 प्रतिशत ही आवाज इसलिए सुन पाते हैं क्योंकि उन्हीं पर हमारा ध्यान होता है, हमें यातायात के शोर में चिड़ियों की आवाज नहीं सुनाई देती।

इसका लाभ : इसका सांसारिक लाभ यह कि सुनने की शक्ति पर लगातार ध्यान देने से व्यक्ति को बढ़ती उम्र के साथ श्रवण दोष का सामना नहीं करना पड़ता, अर्थात बुढ़ापे तक भी सुनने की क्षमता बरकरार रहती है।

इसका आध्यात्मिक लाभ यह कि व्यक्ति दूसरे की भाषा को ग्रहण कर उसके अर्थ निकालने में तो सक्षम हो ही जाता है साथ ही वह अनंत दूर तक की आवाज को भी आसानी से सुन सकता है और चिंटी की आवाज को भी सुनने में सक्षम हो जाता है। यह कहना नहीं चाहिए कि सिर के बालों के धरती पर गिरने की आवाज भी सुनी जा सकती है।

॥शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्संकरस्तत् प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरूपतज्ञानम्।…तत: प्रातिभ श्रावणवेदनादर्षास्वादवात्तर् जायन्ते॥ 3/ 17-3/35॥

हजारों किलोमीटर देखने की शक्ति

ज्योतिष शक्ति : ज्योति का अर्थ है प्रकाश अर्थात प्रकाश स्वरूप ज्ञान। ज्योतिष का अर्थ होता है सितारों का संदेश। संपूर्ण ब्रह्माण्ड ज्योति स्वरूप है। ज्योतिष्मती प्रकृति के प्रकाश को सूक्ष्मादि वस्तुओं में न्यस्त कर उस पर संयम करने से योगी को सूक्ष्म, गुप्त और दूरस्थ पदार्थों का ज्ञान हो जाता है।

लोक ज्ञान शक्ति : सूर्य पर संयम से सूक्ष्म और स्थूल सभी तरह के लोकों का ज्ञान हो जाता है।

नक्षत्र ज्ञान सिद्धि : चंद्रमा पर संयम से सभी नक्षत्रों को पता लगाने की शक्ति प्राप्त होती है।

तारा ज्ञान सिद्धि : ध्रुव तारा हमारी आकाश गंगा का केंद्र माना जाता है। आकाशगंगा में अरबों तारे हैं। ध्रुव पर संयम से समस्त तारों की गति का ज्ञान हो जाता है।
भूत और भविष्य का ज्ञान होना बहुत ही आसान है बशर्ते की व्यक्ति अपने मन से मुक्त हो जाए। आपने त्रिकालदर्शी या सर्वज्ञ योगी जैसे शब्द तो सुने ही होंगे। कैसे कोई त्रिकालदर्शी बन जाता है?

योग के विभूतिपाद में अ‍ष्टसिद्धि के अलावा अन्य अनेकों प्रकार की सिद्धियों का वर्णन मिलता है। उनमें से ही एक है सर्वज्ञ शक्ति योगा। इस योग की साधना करने से व्यक्ति को अगले-पिछले सभी कालों की घटनाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त होने लगता है। यह साधना कठिन जरूर है, लेकिन योगाभ्यासी के लिए सरल

कैसे होगा यह संभव : बुद्धि और पुरुष में पार्थक्य ज्ञान सम्पन्न योगी को दृश्य और दृष्टा का भेद दिखाई देने लगता है। ऐसा योगी संपूर्ण भावों का स्वामी तथा सभी विषयों का ज्ञाता हो जाता है। यम, नियम और ध्यान के अभ्यास से बुद्धि और पुरुष के भेद को जाना जा सकता है।

जब तक आप स्वयं को शरीर, मन या बुद्धि समझते हैं तब तक यह ज्ञान संभव नहीं। शरीर से पृथक समझना, मन के खेल को समझकर उससे अलग हो जाना और बुद्धि के द्वंद्व या तर्क के जाल से अलग हटकर स्वयं को बोध रूप में स्थिर करने से होश का स्तर बढ़ता जाता है तथा धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति भूत, भविष्य वर्तमान सहित अन्य विषयों को जानने वाला बन जाता है।

दृष्य का अर्थ है कि हम जो भी देख रहे हैं वह, और दृष्टा का अर्थ है हम स्वयं। जो व्यक्ति इस भेद को समझकर दृष्य से स्वयं को अलग करने लग जाता है वही सर्वज्ञ शक्ति योगा का ज्ञान प्राप्त करता है।

योगा पैकेज : प्रतिदिन प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करें। आप चाहें तो किसी योग शिक्षक से त्राटक विद्या सिखते हुए यम और नियम के कुछ खास नियमों का पालन करें। जरूरी है होशपूर्ण जीवन शैली। इस बारे में अधिक जानें।

नौकासन, हलासन, ब्रह्म मुद्रा, पश्चिमोत्तनासन, सूर्य नमस्कार। प्राणायम में शीतली, भ्रामरी और भस्त्रिका या यह नहीं करें तो नाड़ी शोधन नियमित करें। सूत्र और जल नेति का अभ्यास करें। मूल और उड्डीयन बंध का प्रयोग भी लाभदायक है।

दूसरे के शरीर में प्रवेश कैसे करें

बस पांच कदम चलना हैं और आप दूसरे के शरीर में होंगे।’

क्या होगा दूसरे के शरीर में प्रवेश करने से? क्या यह संभव है? यह सवाल पूछा जा सकता है। आदि शंकराचार्य यह विधि जानते थे, और भी बहुत से साधक इस तकनीक से अवगत थे, लेकिन आम जनता के लिए तो यह बहुत ही कठिन जान पड़ता है। क्यों?

योग में कहा गया है कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है ‘चित्त की वृत्तियां’। इसीलिए योग सूत्र का पहला सूत्र है- योगस्य चित्तवृत्ति निरोध:। इस चित्त में हजारों जन्मों की आसक्ति, अहंकार काम, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से उपजे कर्म संग्रहित रहते हैं, जिसे संचित कर्म कहते हैं।

यह संचित कर्म ही हमारा प्रारब्ध भी होते हैं और इसी से आगे की दिशा भी तय होती है। इस चित्त की पांच अवस्थाएं होती है जिसे समझ कर ही हम सूक्ष्म शरीर को सक्रिय कर सकते हैं। सूक्ष्म शरीर से बाहर निकल कर ही हम दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

इस चित्त या मानसिक अवस्था के पांच रूप हैं:- (1)क्षिप्त (2) मूढ़ (3)विक्षिप्त (4)एकाग्र और (5)निरुद्व। प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ मानसिक वृत्तियों का निरोध होता है।

(1)क्षिप्त : क्षिप्त अवस्था में चित्त एक विषय से दूसरे विषय पर लगातार दौड़ता रहता है। ऐसे व्यक्ति में विचारों, कल्पनाओं की भरमार रहती है।
(2)मूढ़ : मूढ़ अवस्था में निद्रा, आलस्य, उदासी, निरुत्साह आदि प्रवृत्तियों या आदतों का बोलबाला रहता है।
(3)विक्षिप्त : विक्षिप्तावस्था में मन थोड़ी देर के लिए एक विषय में लगता है पर क्षण में ही दूसरे विषय की ओर चला जाता है। पल प्रति‍पल मानसिक अवस्था बदलती रहती है।
(4)एकाग्र : एकाग्र अवस्था में चित्त देर तक एक विषय पर लगा रहता है। यह अवस्था स्थितप्रज्ञ होने की दिशा में उठाया गया पहला कदम है।
(5)निरुद्व : निरुद्व अवस्था में चित्त की सभी वृत्तियों का लोप हो जाता है और चित्त अपनी स्वाभाविक स्थिर, शान्त अवस्था में आ जाता है। अर्थात व्यक्ति को स्वयं के होने का पूर्ण अहसास होता है। उसके उपर से मन, मस्तिष्क में घुमड़ रहे बादल छट जाते हैं और वह पूर्ण जाग्रत रहकर दृष्टा बन जाता है। यह योग की पहली समाधि अवस्था भी कही गई है।

*ध्यान योग का सहारा : निरुद्व अवस्था को समझें यह व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करती है। यही व्यक्ति का असली स्वरूप है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए सांसार की व्यर्थ की बातों, क्रियाकलापों आदि से ध्यान हटाकर संयमित भोजन का सेवन करते हुए प्रतिदिन ध्यान करना आवश्यक है। इस दौरान कम से कम बोलना और लोगों से कम ही व्यवहार रखना भी जरूरी है।

*ज्ञान योग का सहारा : चित्त की वृत्तियों और संचित कर्म के नाश के लिए योग में ज्ञानयोग का वर्णन मिलता है। ज्ञानयोग का पहला सूत्र है कि स्वयं को शरीर मानना छोड़कर आत्मा मानों। आत्मा का ज्ञान होना सूक्ष्म शरीर के होने का आभास दिलाएगा।

कैसे होगा यह संभव : चित्त जब वृत्ति शून्य (निरुद्व अवस्था) होता है तब बंधन के शिथिल हो जाने पर और संयम द्वारा चित्त की प्रवेश निर्गम मार्ग नाड़ी के ज्ञान से चित्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। यह बहुत आसान है, चित्त की स्थिरता से सूक्ष्म शरीर में होने का अहसास बढ़ता है। सूक्ष्म शरीर के निरंतर अहसास से स्थूल शरीर से बाहर निकलने की इच्‍छा बलवान होती है।

*योग निंद्रा विधि : जब ध्यान की अवस्था गहराने लगे तब निंद्रा काल में जाग्रत होकर शरीर से बाहर निकला जा सकता है। इस दौरान यह अहसास होता रहेगा की स्थूल शरीर सो रहा है। शरीर को अपने सुरक्षित स्थान पर सोने दें और आप हवा में उड़ने का मजा लें। ध्यान रखें किसी दूसरे के शरीर में उसकी इजाजत के बगैर प्रवेश करना अपराध है।

कुंडलिनी जागती है तब क्या होता है?

कुंडलिनी का नाम बहुत सुना है और अब तो बहुत से लोग कहने लगे हैं कि मेरी कुंडलिनी जाग्रत है, लेकिन क्या यह सच है? यह सवाल उन्हें खुद से करना चाहिए। सच मानों तो कुंडलिनी जिसकी भी जाग्रत हो जाती है उसका संसार में रहना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि यह सामान्य घटना नहीं है।

संयम और सम्यक नियमों का पालन करते हुए लगातार ध्यान करने से धीरे धीरे कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है और जब यह जाग्रत हो जाती है तो व्यक्ति पहले जैसा नहीं रह जाता। वह दिव्य पुरुष बन जाता है।

कुंडलिनी एक दिव्य शक्ति है जो सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर शरीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार में स्थित है। जब तक यह इस प्रकार नीचे रहती है तब तक व्यक्ति सांसारिक विषयों की ओर भागता रहता है। परन्तु जब यह जाग्रत होती है तो ऐसा प्रतीत होने लगता है कि कोई सर्पिलाकार तरंग है जो घूमती हुई ऊपर उठ रही है। यह बड़ा ही दिव्य अनुभव होता है।

हमारे शरीर में सात चक्र होते हैं। कुंडलिनी का एक छोर मूलाधार चक्र पर है और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ लिपटा हुआ जब ऊपर की ओर गति करता है तो उसका उद्देश्य सातवें चक्र सहस्रार तक पहुंचना होता है, लेकिन यदि व्यक्ति संयम और ध्यान छोड़ देता है तो यह छोर गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है।

जब कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है तो पहले व्यक्ति को उसके मूलाधार चक्र में स्पंदन का अनुभव होने लगता है। फिर वह कुंडलिनी तेजी से ऊपर उठती है और किसी एक चक्र पर जाकर रुकती है उसके बाद फिर ऊपर उठने लग जाती है। जिस चक्र पर जाकर वह रुकती है उसको व उससे नीचे के चक्रों में स्थित नकारात्मक उर्जा को हमेशा के लिए नष्ट कर चक्र को स्वस्थ और स्वच्छ कर देती है।

कुंडलिनी के जाग्रत होने पर व्यक्ति सांसारिक विषय भोगों से दूर हो जाता है और उसका रूझान आध्यात्म व रहस्य की ओर हो जाता है। कुंडलिनी जागरण से शारीरिक और मानसिक ऊर्जा बढ़ जाती है और व्यक्ति खुद में शक्ति और सिद्धि का अनुभव करने लगता है।

कुंडलिनी जागरण के प्रारंभिक अनुभव : जब कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है तो व्यक्ति को देवी-देवताओं के दर्शन होने लगती हैं। ॐ या हूं हूं की गर्जना सुनाई देने लगती है। आंखों के सामने पहले काला, फिर पील और बाद में नीला रंग दिखाई देना लगता है।

उसे अपना शरीर हवा के गुब्बारे की तरह हल्का लगने लगता है। वह गेंद की तरह एक ही स्थान पर अप-डाउन होने लगता है। उसके गर्दन का भाग ऊंचा उठने लगता है। उसे सिर में चोटी रखने के स्थान पर अर्थात सहस्रार चक्र पर चींटियां चलने जैसा अनुभव होता है और ऐसा लगता है कि मानो कुछ है जो ऊपर जाने की कोशिश कर रहा है। रीढ़ में कंपन होने लगता है। इस तरह के प्रारंभिक अनुभव होते हैं।

ध्यान से एक से अधिक शरीरों का अनुभव

ध्यान करना अद्भुत है। हमारे यूं तो मूलत: तीन शरीर होते हैं। भौतिक, सूक्ष्म और कारण, लेकिन इस शरीर के अलावा और भी शरीर होते हैं। हमारे शरीर में मुख्यत: सात चक्र हैं। प्रत्येक चक्र से जुड़ा हुआ है एक शरीर। बहुत अद्भुत और आश्चर्यजनक है हमारे शरीर की रचना। दिखाई देने वाला भौतिक शरीर सिर्फ खून, हड्डी और मांस का जोड़ ही नहीं है इसे चलायमान रखने वाले शरीर अलग हैं। कुंडलिनी जागरण में इसका अनुभव होता है।

जो व्यक्ति सतत चार से छह माह तक ध्यान करता रहा है उसे कई बार एक से अधिक शरीरों का अनुभव होने लगता है। अर्थात एक तो यह स्थूल शरीर है और उस शरीर से निकलते हुए 2 अन्य शरीर। ऐसे में बहुत से ध्यानी घबरा जाते हैं और वह सोचते हैं कि यह ना जाने क्या है। उन्हें लगता है कि कहीं मेरी मृत्यु न हो जाए। इस अनुभव से घबराकर वे ध्यान करना छोड़ देते हैं। जब एक बार ध्यान छूटता है तो फिर मुश्किल होती है पुन: उसी अवस्था में लौटने में।

इस अनुभव को समझे- जो दिखाई दे रहा है वह हमारा स्थूल शरीर है। दूसरा सूक्ष्म शरीर हमें दिखाई नहीं देता, लेकिन हम उसे नींद में महसूस कर सकते हैं। इसे ही वेद में मनोमय शरीर कहा है। तीसरा शरीर हमारा कारण शरीर है जिसे विज्ञानमय शरीर कहते हैं।

सूक्ष्म शरीर की क्षमता : सूक्ष्म शरीर ने हमारे स्थूल शरीर को घेर रहा है। हमारे शरीर के चारों तरफ जो ऊर्जा का क्षेत्र है वही सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म शरीर भी हमारे स्थूल शरीर की तरह ही है यानि यह भी सब कुछ देख सकता है, सूंघ सकता है, खा सकता है, चल सकता है, बोल सकता है आदि। इसके अलावा इस शरीर की और भी कई क्षमता है जैसे वह दीवार के पार देख सकता है। किसी के भी मन की बात जान सकता है। वह कहीं भी पल भर में जा सकता है। वह पूर्वाभास कर सकता है और अतीत की हर बात जान सकता है आदि।

कारण शरीर की क्षमता : तीसरा शरीर कारण शरीर कहलाता है। कारण शरीर ने सूक्ष्म शरीर को घेर के रखा है। इसे बीज शरीर भी कहते हैं। इसमें शरीर और मन की वासना के बीज विद्यमान होते हैं। यह हमारे विचार, भाव और स्मृतियों का बीज रूप में संग्रह कर लेता है। मृत्यु के बाद स्थूल शरीर कुछ दिनों में ही नष्ट हो जाता और सूक्ष्म शरीर कुछ महिनों में विसरित होकर कारण की ऊर्जा में विलिन हो जाता है, लेकिन मृत्यु के बाद यही कारण शरीर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है और इसी के प्रकाश से पुनः मनोमय व स्थूल शरीर की प्राप्ति होती है अर्थात नया जन्म होता है। कारण शरीर कभी नहीं मरता।

इसी कारण शरीर से कई सिद्ध योगी परकाय प्रवेश में समर्थ हो जाते हैं। जब व्यक्ति निरंतर ध्यान करता है तो कुछ माह बाद यह कारण शरीर हरकत में आने लगता है। अर्थात व्यक्ति की चेतना कारण में स्थित होने लगती है। ध्यान से इसकी शक्ति बढ़ती है। यदि व्यक्ति निडर और होशपूर्वक रहकर निरंतर ध्यान करता रहे तो निश्चित ही वह मृत्यु के पार जा सकता है। मृत्यु के पार जाने का मतलब यह कि अब व्यक्ति ने स्थूल और सूक्ष्म शरीर में रहना छोड़ दिया।

फिर हर चीज खींची चली आएगी आपकी ओर

आप अक्सर सोचते होंगे कि कोई चीज बस देखने भर से आपकी आरे खींची चली आए तो कैसा हो? लेकिन फिर इसे कपोल कल्पना मानकर भूल भी जाते होंगे। क्या आप ये जानते हैं कि यह संभव भी है। इस विद्या को सिद्ध किया जा सकता है और वह भी बहुत अच्छी तरह से। इसके बाद आप जिस चीज को देखेंगे, वह आप की ओर चली आएगी, चाहे इंसान हो या फिर कोई पत्थर।

वास्तव में इसे सम्मोहन, वशीकरण और कई नामों से पुकारा जाता है। सम्मोहन, वशीकरण का ही एक रूप है त्राटक साधना। इसके जरिए हम अपनी आंखों और मस्तिष्क की शक्तियों को जागृत करके उन्हें इतना प्रभावशाली कर सकते हैं कि मात्र सोचने और देखने भर से ही कोई भी चीज हमारे पास आ जाएगी। त्राटक साधना करने के लिए आपको खुद को कुछ दिनों के लिए नियमों में बांधना होगा। त्राटक साधना यानी किसी भी वस्तु को एकटक देखना। यह साधना आप उगते सूर्य, मोमबत्ती, दीया, किसी यंत्र, दीवार या कागज पर बने बिंदू आदि में से किसी को देखकर ही कर सकते हैं।

त्राटक साधना में रखें ये सावधानियां

– इस साधना के समय आपके आसपास शांति हो। इस साधना का सबसे अच्छा समय है आधी रात या फिर ब्रह्म मुहूर्त यानी सुबह 3 से 5 के बीच।

– रात को यदि त्राटक करें तो सबसे अच्छा साधन है मोमबत्ती। मोमबत्ती को जलाकर उसे ऐसे रखें कि वह आपकी आंखों के सामने बराबरी पर हो।

– मोमबत्ती को कम से कम चार फीट की दूरी पर रखें।

– पहले तीन-चार दिन तीन से पांच मिनट तक एकटक मोमबत्ती की लौ को देखें। इस दौरान आपकी आंखें नहीं झपकना चाहिए।

– धीरे-धीरे समय सीमा बढ़ाएं, आप पाएंगे थोड़े ही दिनों में आपकी आंखों की चमक बढ़ गई है और इसमें आकर्षण भी पैदा होने लगा है।

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42 Comments

  1. Kumar said,

    June 16, 2015 at 11:31 pm

    IT IS REALLY

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  2. Neeraj said,

    September 24, 2016 at 12:27 pm

    Very very informative👍👍👍

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  3. siddhant said,

    October 23, 2016 at 12:49 am

    this is achievment of indians which is beyond the science

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  4. sanju singh said,

    December 27, 2016 at 6:44 pm

    Hii sir … ye jankariya bohat kam ki hai.-
    Par jab hum dhyan karte vakt apne bhrukuti par dhyan lagate hai to man mai bhot sare pictures dikhi deti hai .
    Isse kaise bacha jai.

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    • December 27, 2016 at 10:02 pm

      Dekho Sanju me Janta hu k tum aapne aagya chakra ko jagrat krna chahte ho,jisse tum jo mann chaho kr sako 🙂 kher me tumhare sawaal ka jawab deta hu.Tum aabhi Dhyaan krte waqt bhrutiyo par dhyaan kendrit na kro aabhi kewal Dhyaan ko mehatv do.Third eye ko aabhi jagrat krne ki kosis na karo jab dhyaan me gehre hojaoge ye apne aap jagrat hone lagegi. Jab Dhyaan krte ho to kewal apne body par saanso par aane jaane wale vicharo par asspass se aane wali aaawazo pardhyan rakho. Aur jo vichar picture dikhai de rhe hai unse pareshan hone ki zarurat nai hai unko dekho mgr unke piche mt bhaago. jese hum cinema hall me beth kar film dekhte hai theek wese hee inko kewal dekho Tum dekhna tumhe isme aanand aane lagega aur wo samay bhi aayega k tum jo dekhna chahoge wo dikhai dene lagega vicharo se lado mat kewal drstaa hokar dekho.

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  5. sanju singh said,

    December 27, 2016 at 6:46 pm

    Kya sidhi jagrit hone ke baad hum uska istemal kar sakte hai ya vo sirf dhyan ke dwara hi kam karti hai .

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    • December 27, 2016 at 10:05 pm

      Haan jese tum chahte ho k jo tum chaho wo hojaye mgr Sanju Sidhi prapt krna saral nai hota uske liye Dhyaan me gehre hona zaruri hai. haan ye Dhyaan k dwara hee kaam krti hai kyuki dhyaan se hee ye nirmit hoti hai. Aur jab tum Dhyaan me gehre hojaoge to tumhe iske istmal ki zarurat he nai padegi tumahre kaam apne aap he bannne lag jayenge.

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    • December 27, 2016 at 10:10 pm

      Haan Dhyaan to koi bhi kr sakta hai iske liye umar ki zarurt nai aab ye bhi nahi k ek saal k bachhe se karwo. Matlab thodi samjh hona zaruri hai to theek hai

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  6. sanju singh said,

    December 27, 2016 at 7:02 pm

    Dhyan karne ke baad kuch din se padai mai jaida man dhyan ki ore hi rehta hai .
    Aap koi upai batain jis se me dhyan ke sath aapni padhai bhi kar saku.

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    • December 27, 2016 at 10:09 pm

      Sanju ye isliye horha hai kyuki tumhari excitment un sakhtiyo k liye k buss zaldi se miljaaye aur fir me to raja. 🙂 Zald baazi naa karo. Jese apni body muscle banane Gym jaate ho ek din to body nai bann jaati aur gym jaane k sath sath baaki kaam to krte he ho.Theek isi tarah Dhyaan ko aabhi ek part ki tarh hee samjho. zald baazi karoge to kuch haasil nai hoga. iske liye mehnat aur sayam ki aavsakta hai. Sabar se kaam lo positive result tabhi aayenge.

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  7. sanju singh said,

    December 27, 2016 at 7:04 pm

    Kya dhyan kisi umar vala bhi kar sakta hai .

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  8. sanju singh said,

    December 29, 2016 at 7:03 pm

    Hello.. Dhyan nirantar kab tak karna chaiye.

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    • December 30, 2016 at 2:22 am

      Haan Sanju Dekho Dhyaan jo hai kum se kum 45mint krna chiye. zyada se zyada 2 gnte bht hai. Dhyaan krne se zzyada Dhyaan ko saadna chiye.tb wo 45 mint kiya gya dhyaan kaamyaab hoga. jese kisi bimaari ki aapne dawai khaai to khaali dawai hee kaam nai krti parhez krna bhi hota hai tbhi bimari theek hoti hai.Samjhe

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  9. sanju singh said,

    December 29, 2016 at 7:11 pm

    Dhyan karte vakt sabse jada dhyan kaha hona chaiye. Dhyan kitni der tak kar sakte hai. Dhyan se kya bimari khatam hori hai. Hum agar dhyan karte hai to hume kaise pata chalega ki hu dhyan me lin ho gaye hai kya dhyan mai jab dil ki dhadkne ki awaz sunai deti hai.

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    • December 30, 2016 at 2:23 am

      Dekho sanju sabse phele to ye pta chale k tum dhyaan ki kaunsi vidhi kr rhe ho tbhi me bta paaunga. wese Dhyaan jb shuru krte hai to aapni saaso pr fir aaspass hone wali aawajo pr dete hai fir dhire dhire aankho me dikhne wale andkaar par.Aur haaan Dhyaan se bimaari khtm hosakti hai mgr depend krta hai bimari hai kaunsi maansik yaa shaaririk.jb dhyaan krte hai to pta krne ki zarurat nai k leen hue k nai wo apne aap he hojata hai.Jb dhyaan me gehre hojaoge to koi vichar nai dikhai dega. naa ye body mehsus hogi bus ek prakash dikhaai dega aur uske aage kyaa dikhai dega wo apna apna anubhav hai. tum blog me dekh sakte ho ye video bhi dekho https://oshoisyours.wordpress.com/osho-hindi-videos/

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  10. sanju singh said,

    December 29, 2016 at 7:13 pm

    Kya dhyan buddh bhagwan bhi karte the.

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    • December 30, 2016 at 2:23 am

      Haan Buddh bhi Dhyaan krte the Tum unke baare me padna chaho to pad sakte ho bht jaankari hai unke baare me internet par mgr karoge kyaa. Tum khud Buddh ban sakte ho. Dhyaan karo sahi vidhiyo ko chuno.Hone wale anubhavo par vichar karo zaldi mat machao sabr se kaaam lo.

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  11. sanju singh said,

    December 29, 2016 at 11:14 pm

    Sir reply kijiye.

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  12. Neha said,

    February 28, 2017 at 10:02 am

    I liked the post a lot. It really touched the heart. Thanks for sharing with us.

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  13. सत्यदेव त्यागी said,

    May 21, 2017 at 4:39 am

    मैं ध्यान साधना करता हु और आज्ञाचक्र में ध्यान लगते समय काला, सफ़ेद और फिर नीले रंग की रौशनी दिखती है ! इसी बीच मेरे सहसहरार साहसह्रार चक्र में चींटी से नीचे से ऊपर की और चलती हुई धीरे धीरे पुरे स्कुल में महसूस होती है ! अब आगे क्या करना चाहिए !
    कृपया मार्गदर्शन करे !
    मुझे गुरु बाबा जी की कृपा से शाम्भवी शक्तिपात प्राप्त है

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  14. Dipak Verma said,

    May 25, 2017 at 11:40 am

    Good knowledge sir

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  15. Dipak Verma said,

    May 25, 2017 at 11:42 am

    Good knowledge culection sir

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  16. jitu said,

    September 24, 2017 at 9:10 am

    jo cheez pana chaho usko pane ke liye kaun sa dhyan krna chahiye ? Main kewal man ko shant krne ka dhyan krta hu filhal. Jab ‘no mind state’ me pahunch jata hu to neend ajati hai, kahi main galat to nahi kar raha ? Please batayie….

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    • October 4, 2017 at 3:05 am

      Hello
      Maafi chahta hu me reply nai de paaya is blog ko kholne me time nai mila. Mene is blog me apna whtsapp group link dala tha jisse jo bhi koi aaye use me add kr saku aur unke liye suvidha hojaye. Me kuch din ke liye apna number daal rha hu fir me isse hata dunga. Aap muje call kijiye me aapko whtsapp meditation group me daal dunga jaha aap sawaal jawaab aaram se kr sakte hai. Dhnywaad

      Mobile:
      Swami Dhyaan Nirmal : 9990493010

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  17. Rahul Urheakr said,

    January 17, 2018 at 1:44 am

    jab mai dhyan karta hu to mera sar gubbare ke tarah lagne lagta hai muze aisa pratit hota hai ki mere sar me hava bhari huvi hai aur vo gubbare ke tarah mahesoos hota hai.

    ye kya hai ?

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  18. Deo Prakash Sharma said,

    April 18, 2018 at 3:40 am

    ध्यान से प्राप्त सिद्धियाँ क्या दूसरों के हित के लिए भी नही किया जाना चाहिये?

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  19. Sundar Singh said,

    July 14, 2018 at 12:13 pm

    Me aapse puchna chahoonga Bina yog k sabhav ki aap apne sharir me ek Shakti ka anubhav kare aap jis eshvar ko mante hai use yaad Karne ya unki baat hone par sharir me rongte ya alag Shakti mehsoos kare

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  20. harshit said,

    August 2, 2018 at 7:44 pm

    sir jb m meditation krta hu toh mujhe dil ki awaaz aur ek awaaz dimag se ati h phir kya krna chayiye wo mujhe samaj nhi ata..kriya krke aap bataye..

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  21. Vijay lohani said,

    November 24, 2018 at 7:05 am

    Aap ne jitni bhi baaten batayi hai mujhe wo sab baten saty lag rahi hain .kyon ki aap saty bol rahe ho our ismen se sab ghatnayen mere sath ho chuki hain , our mujhe to isse bhi khatarnaak anubhaw huwe hain ,, mujhe sabki aawj3n sunayi deti thi our jaisa men bolta tha waisa hota tha jaisa ki barish aana our bhi bahut kuch,to ab men kya karun .our kya meri chati indriy jagrit hai

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  22. Avinash said,

    November 26, 2018 at 10:31 am

    Pls send me the link of your WhatsApp group…

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