Meditation in Hindi

ध्यान क्या है…?

जापानी का झेन और चीन का च्यान यह दोनों ही शब्द ध्‍यान के अप्रभंश है। अंग्रेजी में इसे मेडिटेशन कहते हैं, लेकिन अवेयरनेस शब्द इसके ज्यादा नजदीक है। हिन्दी का बोध शब्द इसके करीब है। ध्यान का मूल अर्थ है जागरूकता, अवेयरनेस, होश, साक्ष‍ी भाव और दृष्टा भाव।

योग का आठवां अंग ध्यान अति महत्वपूर्ण हैं। एक मात्र ध्यान ही ऐसा तत्व है कि उसे साधने से सभी स्वत: ही सधने लगते हैं, लेकिन योग के अन्य अंगों पर यह नियम लागू नहीं होता। ध्यान दो दुनिया के बीच खड़े होने की स्थिति है।

ध्यान की परिभाषा : तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम।। 3-2 ।।-योगसूत्र अर्थात- जहां चित्त को लगाया जाए उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, लेकिन ध्यान का अर्थ है जहां भी चित्त ठहरा हुआ है उसमें वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। उसमें जाग्रत रहना ध्यान है।

ध्यान का अर्थ : ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। आमतौर पर आम लोगों का ध्यान बहुत कम वॉट का हो सकता है, लेकिन योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है जिसकी जद में ब्रह्मांड की हर चीज पकड़ में आ जाती है।

क्रिया नहीं है ध्यान : बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं- जैसे सुदर्शन क्रिया, भावातीत ध्यान और सहज योग ध्यान। दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है।

बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की क्रांतिकारी विधियां बताते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि विधि और ध्यान में फर्क है। क्रिया और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो ओजार है। क्रिया तो झाड़ू की तरह है।

आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पांच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो- यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है। ध्यान है क्रियाओं से मुक्ति। विचारों से मुक्ति।

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ध्यान का स्वरूप : हमारे मन में एक साथ असंख्य कल्पना और विचार चलते रहते हैं। इससे मन-मस्तिष्क में कोलाहल-सा बना रहता है। हम नहीं चाहते हैं फिर भी यह चलता रहता है। आप लगातार सोच-सोचकर स्वयं को कम और कमजोर करते जा रहे हैं। ध्यान अनावश्यक कल्पना व विचारों को मन से हटाकर शुद्ध और निर्मल मौन में चले जाना है।

ध्यान जैसे-जैसे गहराता है व्यक्ति साक्षी भाव में स्थित होने लगता है। उस पर किसी भी भाव, कल्पना और विचारों का क्षण मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता। मन और मस्तिष्क का मौन हो जाना ही ध्यान का प्राथमिक स्वरूप है। विचार, कल्पना और अतीत के सुख-दुख में जीना ध्यान विरूद्ध है।

ध्यान में इंद्रियां मन के साथ, मन बुद्धि के साथ और बुद्धि अपने स्वरूप आत्मा में लीन होने लगती है। जिन्हें साक्षी या दृष्टा भाव समझ में नहीं आता उन्हें शुरू में ध्यान का अभ्यास आंख बंद करने करना चाहिए। फिर अभ्यास बढ़ जाने पर आंखें बंद हों या खुली, साधक अपने स्वरूप के साथ ही जुड़ा रहता है और अंतत: वह साक्षी भाव में स्थिति होकर किसी काम को करते हुए भी ध्यान की अवस्था में रह सकता है।

क्या होता है ध्यान से?

सवाल पूछा जा सकता है कि क्या होता है ध्यान से? ध्यान क्यों करें? आप यदि सोना बंद कर दें तो क्या होगा? नींद आपको फिर से जिंदा करती है। उसी तरह ध्यान आपको इस विराट ब्रह्मांड के प्रति सजग करता है। वह आपके आसपास की उर्जा को बढ़ाता है कहना चाहिए की आपकी रोशनी को बढ़ाकर आपको आपकी होने की स्थिति से अवगत कराता है। अन्यथा लोगों को मरते दम तक भी यह ध्यान नहीं रहता कि वे जिंदा भी थे।

ध्यान से व्यक्ति को बेहतर समझने और देखने की शक्ति मिलती है। साक्षी भाव में रहकर ही आप स्ट्रांग बन सकते हो। यह आपके शरीर, मन और आपके (आत्मा) के बीच लयात्मक संबंध बनाता है। दूसरों की अपेक्षा आपके देखने और सोचने का दृष्टिकोण एकदम अलग होगा है। ज्यादातर लोग पशु स्तर पर ही सोचते, समझते और भाव करते हैं। उनमें और पशु में कोई खास फर्क नहीं रहता।

बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी गुस्से से भरा, ईर्ष्या, लालच, झूठ और कामुकता से भरा हो सकता है। लेकिन ध्यानी व्यक्ति ही सही मायने में यम और नियम को साध लेता है।

इसके अलावा ध्यान योग का महत्वपूर्ण तत्व है जो तन, मन और आत्मा के बीच लयात्मक सम्बन्ध बनाता है। ध्यान के द्वारा हमारी उर्जा केन्द्रित होती है। उर्जा केन्द्रित होने से मन और शरीर में शक्ति का संचार होता है एवं आत्मिक बल बढ़ता है। ध्यान से वर्तमान को देखने और समझने में मदद मिलती है। वर्तमान में हमारे सामने जो लक्ष्य है उसे प्राप्त करने की प्रेरण और क्षमता भी ध्यान से प्राप्त होता है।

आप मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे में वह नहीं पा सकते जो ध्यान आपको दे सकता है। ध्यान ही धर्म का सत्य है बाकी सभी तर्क और दर्शन की बाते हैं जो सत्य नहीं भी हो सकती है। सभी महान लोगों ने ध्यान से ही सब कुछ पाया है।-

ध्‍यान का लाभ

हम ध्यान है। सोचो की हम क्या है- आंख? कान? नाक? संपूर्ण शरीर? मन या मस्तिष्क? नहीं हम इनमें से कुछ भी नहीं। ध्यान हमारे तन, मन और आत्मा के बीच लयात्मक सम्बन्ध बनाता है। स्वयं को पाना है तो ध्यान जरूरी है। वहीं एकमात्र विकल्प है।

आत्मा को जानना : ध्यान का नियमित अभ्यास करने से आत्मिक शक्ति बढ़ती है। आत्मिक शक्ति से मानसिक शांति की अनुभूति होती है। मानसिक शांति से शरीर स्वस्थ अनुभव करता है। ध्यान के द्वारा हमारी उर्जा केंद्रित होती है। उर्जा केंद्रित होने से मन और शरीर में शक्ति का संचार होता है एवं आत्मिक बल मिलता है।

ध्यान से विजन पॉवर बढ़ता है तथा व्यक्ति में निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है। ध्यान से सभी तरह के रोग और शोक मिट जाते हैं। ध्यान से हमारा तन, मन और मस्तिष्क पूर्णत: शांति, स्वास्थ्य और प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

क्या होगा ध्यान से : हर तरह का भय जाता रहेगा। चिंता और चिंतन से उपजे रोगों का खात्मा होगा। शरीर में शांति होगी तो स्वस्थ अनुभव करेंगे। कार्य और व्यवहार में सुधार होगा। रिश्तों में तनाव की जगह प्रेम होगा। दृष्टिकोण सकारात्मक होगा। सफलता के बारे में सोचने मात्र से ही सफलता आपके नजदीक आने लगेगी।

ध्यान का महत्व : ध्यान से वर्तमान को देखने और समझने में मदद मिलती है। शुद्ध रूप से देखने की क्षमता बढ़ने से विवेक जाग्रत होगा। विवेक के जाग्रत होने से होश बढ़ेगा। होश के बढ़ने से मृत्यु काल में देह के छूटने का बोध रहेगा। देह के छूटने के बाद जन्म आपकी मुट्‍ठी में होगा। यही है ध्यान का महत्व।

सिर्फ तुम : खुद तक पहुंचने का एक मात्र मार्ग ध्‍यान ही है। ध्यान को छोड़कर बाकी सारे उपाय प्रपंच मात्र है। यदि आप ध्यान नहीं करते हैं तो आप स्वयं को पाने से चूक रहे हैं। स्वयं को पाने का अर्थ है कि हमारे होश पर भावना और विचारों के जो बादल हैं उन्हें पूरी तरह से हटा देना और निर्मल तथा शुद्ध हो जाना।

ज्ञानीजन कहते हैं कि जिंदगी में सब कुछ पा लेने की लिस्ट में सबमें ऊपर स्वयं को रखो। मत चूको स्वयं को। 70 साल सत्तर सेकंड की तरह बीत जाते हैं। योग का लक्ष्य यह है कि किस तरह वह तुम्हारी तंद्रा को तोड़ दे इसीलिए यम, नियम, आसन, प्राणायम, प्रत्याहार और धारणा को ध्यान तक पहुँचने की सीढ़ी बनाया है।

ध्यान के लाभ जानें :
ध्यान से मानसिक लाभ- शोर और प्रदूषण के माहौल के चलते व्यक्ति निरर्थक ही तनाव और मानसिक थकान का अनुभव करता रहता है। ध्यान से तनाव के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है। निरंतर ध्यान करते रहने से जहां मस्तिष्क को नई उर्जा प्राप्त होती है वहीं वह विश्राम में रहकर थकानमुक्त अनुभव करता है। गहरी से गहरी नींद से भी अधिक लाभदायक होता है ध्यान।

विशेष : आपकी चिंताएं कम हो जाती हैं। आपकी समस्याएं छोटी हो जाती हैं। ध्यान से आपकी चेतना को लाभ मिलता है। ध्यान से आपके भीतर सामंजस्यता बढ़ती है। जब भी आप भावनात्मक रूप से अस्थिर और परेशान हो जाते हैं, तो ध्यान आपको भीतर से स्वच्छ, निर्मल और शांत करते हुए हिम्मत और हौसला बढ़ाता है।

ध्यान से शरीर को मिलता लाभ- ध्यान से जहां शुरुआत में मन और मस्तिष्क को विश्राम और नई उर्जा मिलती है वहीं शरीर इस ऊर्जा से स्वयं को लाभांवित कर लेता है। ध्यान करने से शरीर की प्रत्येक कोशिका के भीतर प्राण शक्ति का संचार होता है। शरीर में प्राण शक्ति बढ़ने से आप स्वस्थ अनुभव महसूस करते हैं।

विशेष : ध्यान से उच्च रक्तचाप नियंत्रित होता है। सिरदर्द दूर होता है। शरीर में प्रतिरक्षण क्षमता का विकास होता है, जोकि किसी भी प्रकार की बीमारी से लड़ने में महत्वपूर्ण है। ध्यान से शरीर में स्थिरता बढ़ती है। यह स्थिरता शरीर को मजबूत करती है।

आध्यात्मिक लाभ- जो व्यक्ति ध्यान करना शुरू करते हैं, वह शांत होने लगते हैं। यह शांति ही मन और शरीर को मजबूती प्रदान करती है। ध्यान आपके होश पर से भावना और विचारों के बादल को हटाकर शुद्ध रूप से आपको वर्तमान में खड़ा कर देता है। ध्यान से काम, क्रोध, मद, लोभ और आसक्ति आदि सभी विकार समाप्त हो जाते हैं। निरंतर साक्षी भाव में रहने से जहां सिद्धियों का जन्म होता है वहीं सिद्धियों में नहीं उलझने वाला व्यक्ति समाधी को प्राप्त लेता है।

कैसे उठाएं ध्यान से लाभ : ध्यान से भरपूर लाभ प्राप्त करने के लिए नियमित अभ्यास करना आवश्यक है। ध्यान करने में ज्यादा समय की जरूरत नहीं मात्र पांच मिनट का ध्यान आपको भरपूर लाभ दे सकता है बशर्ते की आप नियमित करते हैं।

यदि ध्यान आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है तो यह आपके दिन का सबसे बढ़िया समय बन जाता है। आपको इससे आनंद की प्राप्ति होती है। फिर आप इसे पांच से दस मिनट तक बढ़ा सकते हैं। पांच से दस मिनट का ध्यान आपके मस्तिष्क में शुरुआत में तो बीज रूप से रहता है, लेकिन 3 से 4 महिने बाद यह वृक्ष का आकार लेने लगता है और फिर उसके परिणाम आने शुरू हो जाते हैं।

ध्यान की शुरुआत

ध्यान की शुरुआत के पूर्व की क्रिया- ‘मैं क्यों सोच रहा हूं’ इस पर ध्यान दें।’ हमारा ‘विचार’ भविष्य और अतीत की हरकत है। विचार एक प्रकार का विकार है। वर्तमान में जीने से ही जागरूकता जन्मती है। भविष्य की कल्पनाओं और अतीत के सुख-दुख में जीना ध्यान विरूद्ध है।

स्टेप- 1 : ओशो के अनुसार ध्यान शुरू करने से पहले आपका रेचन हो जाना जरूरी है अर्थात आपकी चेतना (होश) पर छाई धूल हट जानी जरूरी है। इसके लिए चाहें तो कैथार्सिस या योग का भस्त्रिका, कपालभाति प्राणायाम कर लें। आप इसके अलावा अपने शरीर को थकाने के लिए और कुछ भी कर सकते हैं।

स्टेप 2 : शुरुआत में शरीर की सभी हलचलों पर ध्यान दें और उसका निरीक्षण करें। बाहर की आवाज सुनें। आपके आस-पास जो भी घटित हो रहा है उस पर गौर करें। उसे ध्यान से सुनें।

स्टेप 3 : फिर धीरे-धीरे मन को भीतर की ओर मोड़े। विचारों के क्रिया-कलापों पर और भावों पर चुपचाप गौर करें। इस गौर करने या ध्यान देने के जरा से प्रयास से ही चित्त स्थिर होकर शांत होने लगेगा। भीतर से मौन होना ध्यान की शुरुआत के लिए जरूरी है।

स्टेप 4 : अब आप सिर्फ देखने और महसूस करने के लिए तैयार हैं। जैसे-जैसे देखना और सुनना गहराएगा आप ध्यान में उतरते जाएंगे।

ध्यान की शुरुआती विधि : प्रारंभ में सिद्धासन में बैठकर आंखें बंद कर लें और दाएं हाथ को दाएं घुटने पर तथा बाएं हाथ को बाएं घुटने पर रखकर, रीढ़ सीधी रखते हुए गहरी श्वास लें और छोड़ें। सिर्फ पांच मिनट श्वासों के इस आवागमन पर ध्यान दें कि कैसे यह श्वास भीतर कहां तक जाती है और फिर कैसे यह श्वास बाहर कहां तक आती है।

पूर्णत: भीतर कर मौन का मजा लें। मौन जब घटित होता है तो व्यक्ति में साक्षी भाव का उदय होता है। सोचना शरीर की व्यर्थ क्रिया है और बोध करना मन का स्वभाव है।

ध्यान की अवधि : उपरोक्त ध्यान विधि को नियमित 30 दिनों तक करते रहें। 30 दिनों बाद इसकी समय अवधि 5 मिनट से बढ़ाकर अगले 30 दिनों के लिए 10 मिनट और फिर अगले 30 दिनों के लिए 20 मिनट कर दें। शक्ति को संवरक्षित करने के लिए 90 दिन काफी है। इसे जारी रखें।

सावधानी : ध्यान किसी स्वच्छ और शांत वातावरण में करें। ध्यान करते वक्त सोना मना है। ध्यान करते वक्त सोचना बहुत होता है। लेकिन यह सोचने पर कि ‘मैं क्यों सोच रहा हूं’ कुछ देर के लिए सोच रुक जाती है। सिर्फ श्वास पर ही ध्यान दें और संकल्प कर लें कि 20 मिनट के लिए मैं अपने दिमाग को शून्य कर देना चाहता हूं।

अंतत: ध्यान का अर्थ ध्यान देना, हर उस बात पर जो हमारे जीवन से जुड़ी है। शरीर पर, मन पर और आस-पास जो भी घटित हो रहा है उस पर। विचारों के क्रिया-कलापों पर और भावों पर। इस ध्यान देने के जारा से प्रयास से ही हम अमृत की ओर एक-एक कदम बढ़ सकते है।

ध्यान और विचार : जब आंखें बंद करके बैठते हैं तो अक्सर यह शिकायत रहती है कि जमाने भर के विचार उसी वक्त आते हैं। अतीत की बातें या भविष्य की योजनाएं, कल्पनाएं आदि सभी विचार मक्खियों की तरह मस्तिष्क के आसपास भिनभिनाते रहते हैं। इससे कैसे निजात पाएं? माना जाता है कि जब तक विचार है तब तक ध्यान घटित नहीं हो सकता।

अब कोई मानने को भी तैयार नहीं होता कि निर्विचार भी हुआ जा सकता है। कोशिश करके देखने में क्या बुराई है। ओशो कहते हैं कि ध्यान विचारों की मृत्यु है। आप तो बस ध्यान करना शुरू कर दें। जहां पहले 24 घंटे में चिंता और चिंतन के 30-40 हजार विचार होते थे वहीं अब उनकी संख्या घटने लगेगी। जब पूरी घट जाए तो बहुत बड़ी घटना घट सकती है।

ध्यान के प्रकार

आपने आसन और प्राणायाम के प्रकार जाने हैं, लेकिन ध्यान के प्रकार बहुत कम लोग ही जानते हैं। निश्चित ही ध्यान को प्रत्येक व्यक्ति की मनोदशा के अनुसार ढाला गया है

मूलत: ध्यान को चार भागों में बांटा जा सकता है– 1.देखना, 2.सुनना, 3.श्वास लेना और 4.आंखें बंदकर मौन होकर सोच पर ध्‍यान देना। देखने को दृष्टा या साक्षी ध्यान, सुनने को श्रवण ध्यान, श्वास लेने को प्राणायाम ध्यान और आंखें बंदकर सोच पर ध्यान देने को भृकुटी ध्यान कह सकते हैं। उक्त चार तरह के ध्यान के हजारों उप प्रकार हो सकते हैं।

उक्त चारों तरह का ध्यान आप लेटकर, बैठकर, खड़े रहकर और चलते-चलते भी कर सकते हैं। उक्त तरीकों को में ही ढलकर योग और हिन्दू धर्म में ध्यान के हजारों प्रकार बताएं गए हैं जो प्रत्येक व्यक्ति की मनोदशा अनुसार हैं। भगवान शंकर ने मां पार्वती को ध्यान के 112 प्रकार बताए थे जो ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ में संग्रहित हैं।

देखना : ऐसे लाखों लोग हैं जो देखकर ही सिद्धि तथा मोक्ष के मार्ग चले गए। इसे दृष्टा भाव या साक्षी भाव में ठहरना कहते हैं। आप देखते जरूर हैं, लेकिन वर्तमान में नहीं देख पाते हैं। आपके ढेर सारे विचार, तनाव और कल्पना आपको वर्तमान से काटकर रखते हैं। बोधपूर्वक अर्थात होशपूर्वक वर्तमान को देखना और समझना (सोचना नहीं) ही साक्षी या दृष्टा ध्यान है।

सुनना : सुनकर श्रवण बनने वाले बहुत है। कहते हैं कि सुनकर ही सुन्नत नसीब हुई। सुनना बहुत कठीन है। सुने ध्यान पूर्वक पास और दूर से आने वाली आवाजें। आंख और कान बंदकर सुने भीतर से उत्पन्न होने वाली आवाजें। जब यह सुनना गहरा होता जाता है तब धीरे-धीरे सुनाई देने लगता है- नाद। अर्थात ॐ का स्वर।

श्वास पर ध्यान : बंद आंखों से भीतर और बाहर गहरी सांस लें, बलपूर्वक दबाब डाले बिना यथासंभव गहरी सांस लें, आती-जाती सांस के प्रति होशपूर्ण और सजग रहे। बस यही प्राणायाम ध्यान की सरलतम और प्राथमिक विधि है।

भृकुटी ध्यान : आंखें बंद करके दोनों भोओं के बीच स्थित भृकुटी पर ध्यान लगाकर पूर्णत: बाहर और भीतर से मौन रहकर भीतरी शांति का अनुभव करना। होशपूर्वक अंधकार को देखते रहना ही भृकुटी ध्यान है। कुछ दिनों बाद इसी अंधकार में से ज्योति का प्रकटन होता है। पहले काली, फिर पीली और बाद में सफेद होती हुई नीली।

अब हम ध्यान के पारंपरिक प्रकार की बात करते हैं। यह ध्यान तीन प्रकार का होता है- 1.स्थूल ध्यान, 2.ज्योतिर्ध्यान और 3.सूक्ष्म ध्यान।

1.स्थूल ध्यान- स्थूल चीजों के ध्यान को स्थूल ध्यान कहते हैं- जैसे सिद्धासन में बैठकर आंख बंदकर किसी देवता, मूर्ति, प्रकृति या शरीर के भीतर स्थित हृदय चक्र पर ध्यान देना ही स्थूल ध्यान है। इस ध्यान में कल्पना का महत्व है।

2.ज्योतिर्ध्यामूलाधार और लिंगमूल के मध्य स्थान में कुंडलिनी सर्पाकार में स्थित है। इस स्थान पर ज्योतिरूप ब्रह्म का ध्यान करना ही ज्योतिर्ध्यान है।

3.सूक्ष्म ध्यासाधक सांभवी मुद्रा का अनुष्ठान करते हुए कुंडलिनी का ध्यान करे, इस प्रकार के ध्यान को सूक्ष्म ध्यान कहते हैं।

ध्यान के चमत्कारिक अनुभव

ध्यान के अनुभव निराले हैं। जब मन मरता है तो वह खुद को बचाने के लिए पूरे प्रयास करता है। जब विचार बंद होने लगते हैं तो मस्तिष्क ढेर सारे विचारों को प्रस्तुत करने लगता है। जो लोग ध्यान के साथ सतत ईमानदारी से रहते हैं वह मन और मस्तिष्क के बहकावे में नहीं आते हैं, लेकिन जो बहकावे में आ जाते हैं वह कभी ध्यानी नहीं बन सकते।

प्रत्येक ध्यानी को ध्यान के अलग-अलग अनुभव होते हैं। यह उसकी शारीरिक रचना और मानसिक बनावट पर निर्भर करता है कि उसे शुरुआत में क‍िस तरह के अनुभव होंगे। लेकिन ध्यान के एक निश्चित स्तर पर जाने के बाद सभी के अनुभव लगभग समान होने लगते हैं।

शुरुआती अनुभव : शुरुआत में ध्यान करने वालों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं। पहले भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर अंधेरा दिखाई देने लगता है। अंधेरे में कहीं नीला और फिर कहीं पीला रंग दिखाई देने लगता है।

यह गोलाकार में दिखाई देने वाले रंग हमारे द्वारा देखे गए दृष्य जगत का रिफ्‍लेक्शन भी हो सकते हैं और हमारे शरीर और मन की हलचल से निर्मित ऊर्जा भी। गोले के भीतर गोले चलते रहते हैं जो कुछ देर दिखाई देने के बाद अदृश्य हो जाते हैं और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है। यह क्रम चलता रहता है।

कुछ ज्ञानीजन मानते हैं कि नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं जीवात्मा का रंग है। नीले रंग के रूप में जीवात्मा ही दिखाई पड़ती है। पीला रंग जीवात्मा का प्रकाश है। इस प्रकार के गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत होने का लक्षण भी माना जाता है।

इसका लाभ : कुछ दिनों बाद इसका पहला लाभ यह मिलता है कि व्यक्ति के मन और मस्तिष्क से तनाव और चिंता हट जाती है और वह शांति का अनुभव करता है। इसके साथ ही मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे वह असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेता है। ऐसा व्यक्ति भूत और भविष्य की कल्पनाओं में नहीं जिता।

दूसरा लाभ यह कि लगातार भृकुटी पर ध्यान लगाते रहने से कुछ माह बाद व्यक्ति को भूत, भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्ष दीखने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति को भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि उसकी छटी इंद्री जाग्रत होने लगी है और अब उसे ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। यदि आगे प्रगति करना है तो ऐसे व्यक्ति को लोगो से अपने संपर्क समाप्त करने की हिदायत दी जाती है, लेकिन जो व्यक्ति इसका दुरुपयोग करता है उसे योगभ्रष्ट कहा जाता है।

कैसे करें ध्यान की तैयारी

यदि आपने ध्यान करने का पक्का मन बना ही लिया है और इसे नियमित करने का संकल्प ले ही लिया है तो फिर आप अब ध्यान की तैयारी करें। इससे कहले हम ‘ध्यान की शुरुआत’ और ‘कैसे करें ध्यना’ पर लिख चुके हैं। नीचे इस संबंध में लिंक देखें। यहां प्रस्तुत है ध्यान की तैयारी के संबंध में सामान्य जानकारी।

  1. बेहतर स्थान : ध्यान की तैयारी से पूर्व आपको ध्यान करने के स्‍थान का चयन करना चाहिए। ऐसा स्थान जहां शांति हो और बाहर का शोरगुल सुनाई न देता हो। साथ ही वह खुला हुआ और हरा-भरा हो। आप ऐसा माहौल अपने एक रूम में भी बना सकते हो।

जरूरी यह है कि आप शोरगुल और दम घोंटू वातावरण से बचे और शांति तथा सकून देने वाले वातारवण में रहे जहां मन भटकता न हो। यदि यह सब नहीं हैं तो ध्यान किसी ऐसे बंद कमरे में भी कर सकते हैं जहां उमस और मच्छर नहीं हो बल्कि ठंडक हो और वातावरण साफ हो। आप मच्छरदारी और एक्झास फेन का स्तेमाल भी कर सकते हैं।

  1. वातावण हो सुगंधित : सुगंधित वातावरण को ध्यान की तैयारी में शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए सुगंध या इत्र का इस्तेमाल कर सकते हैं या थोड़े से गुड़ में घी तथा कपूर मिलाकर कंडे पर जला दें कुछ देर में ही वातावरण ध्यान लायक बन जाएगा।
  2. ध्यान की बैठक : ध्यान के लिए नर्म और मुलायम आसान होना चाहिए जिस पर बैठकर आराम और सूकुन का अनुभव हो। बहुत देर तक बैठे रहने के बाद भी थकान या अकड़न महसूस न हो। इसके लिए भूमि पर नर्म आसन बिछाकर दीवार के सहारे पीठ टिकाकर भी बैठ सकते हैं अथवा पीछे से सहारा देने वाली आराम कुर्सी पर बैठकर भी ध्यान कर सकते हैं।

आसन में बैठने का तरीका ध्यान में काफी महत्व रखता रखता है। ध्यान की क्रिया में हमेशा सीधा तनकर बैठना चाहिए। दोनों पैर एक दूसरे पर क्रास की तरह होना चाहिए या आप सिद्धासन में भी बैठ सकते हैं।

4.समय : ध्यान के लिए एक निश्चित समय बना लेना चाहिए इससे कुछ दिनों के अभ्यास से यह दैनिक क्रिया में शामिल हो जाता है फलत ध्यान लगाना आसान हो जाता है।

  1. सावधानी : ध्यान में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इस क्रिया में किसी प्रकार का तनाव नहीं हो और आपकी आंखें बंद, स्थिर और शांत हों तथा ध्यान भृकुटी पर रखें। खास बात की आप ध्यान में सोएं नहीं बल्कि साक्षी भाव में रहें।

ध्यान में होने वाले अनुभव

साधकों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं. अनेक साधकों के ध्यान में होने वाले अनुभव एकत्रित कर यहाँ वर्णन कर रहे हैं ताकि नए साधक अपनी साधना में अपनी साधना में यदि उन अनुभवों को अनुभव करते हों तो वे अपनी साधना की प्रगति, स्थिति व बाधाओं को ठीक प्रकार से जान सकें और स्थिति व परिस्थिति के अनुरूप निर्णय ले सकें.

१. भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर पहले काला और फिर नीला रंग दिखाई देता है. फिर पीले रंग की परिधि वाले नीला रंग भरे हुए गोले एक के अन्दर एक विलीन होते हुए दिखाई देते हैं. एक पीली परिधि वाला नीला गोला घूमता हुआ धीरे-धीरे छोटा होता हुआ अदृश्य हो जाता है और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है. इस प्रकार यह क्रम बहुत देर तक चलता रहता है. साधक यह सोचता है इक यह क्या है, इसका अर्थ क्या है ? इस प्रकार दिखने वाला नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं जीवात्मा का रंग है. नीले रंग के रूप में जीवात्मा ही दिखाई पड़ती है. पीला रंग आत्मा का प्रकाश है जो जीवात्मा के आत्मा के भीतर होने का संकेत है.

इस प्रकार के गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत होने का लक्षण है. इससे भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्षा दीखने लगते है और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं. साथ ही हमारे मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे हम असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेते हैं.

२. कुण्डलिनी जागरण का अनुभव :-

कुण्डलिनी वह दिव्य शक्ति है जिससे सब जीव जीवन धारण करते हैं, समस्त कार्य करते हैं और फिर परमात्मा में लीन हो जाते हैं. अर्थात यह ईश्वर की साक्षात् शक्ति है. यह कुदालिनी शक्ति सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर शारीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार चक्र में स्थित होती है. जब तक यह इस प्रकार नीचे रहती है तब तक हम सांसारिक विषयों की ओर भागते रहते हैं. परन्तु जब यह जाग्रत होती है तो उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि कोई सर्पिलाकार तरंग है जिसका एक छोर मूलाधार चक्र पर जुदा हुआ है और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ घूमता हुआ ऊपर उठ रहा है. यह बड़ा ही दिव्य अनुभव होता है. यह छोर गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है.

जब कुण्डलिनी जाग्रत होने लगती है तो पहले मूलाधार चक्र में स्पंदन का अनुभव होने लगता है. यह स्पंदन लगभग वैसा ही होता है जैसे हमारा कोई अंग फड़कता है. फिर वह कुण्डलिनी तेजी से ऊपर उठती है और किसी एक चक्र पर जाकर रुक जाती है. जिस चक्र पर जाकर वह रूकती है उसको व उससे नीचे के चक्रों को वह स्वच्छ कर देती है, यानि उनमें स्थित नकारात्मक उर्जा को नष्ट कर देती है. इस प्रकार कुण्डलिनी जाग्रत होने पर हम सांसारिक विषय भोगों से विरक्त हो जाते हैं और ईश्वर प्राप्ति की ओर हमारा मन लग जाता है. इसके अतिरिक्त हमारी कार्यक्षमता कई गुना बढ जाती है. कठिन कार्य भी हम शीघ्रता से कर लेते हैं.

३. कुण्डलिनी जागरण के लक्षण :

कुण्डलिनी जागरण के सामान्य लक्षण हैं : ध्यान में ईष्ट देव का दिखाई देना या हूं हूं या गर्जना के शब्द करना, गेंद की तरह एक ही स्थान पर फुदकना, गर्दन का भाग ऊंचा उठ जाना, सर में चोटी रखने की जगह यानि सहस्रार चक्र पर चींटियाँ चलने जैसा लगना, कपाल ऊपर की तरफ तेजी से खिंच रहा है ऐसा लगना, मुंह का पूरा खुलना और चेहरे की मांसपेशियों का ऊपर खींचना और ऐसा लगना कि कुछ है जो ऊपर जाने की कोशिश कर रहा है.

४. एक से अधिक शरीरों का अनुभव होना :

कई बार साधकों को एक से अधिक शरीरों का अनुभव होने लगता है. यानि एक तो यह स्थूल शारीर है और उस शरीर से निकलते हुए २ अन्य शरीर. तब साधक कई बार घबरा जाता है. वह सोचता है कि ये ना जाने क्या है और साधना छोड़ भी देता है. परन्तु घबराने जैसी कोई बात नहीं होती है.

एक तो यह हमारा स्थूल शरीर है. दूसरा शरीर सूक्ष्म शरीर (मनोमय शरीर) कहलाता है तीसरा शरीर कारण शारीर कहलाता है. सूक्ष्म शरीर या मनोमय शरीर भी हमारे स्थूल शारीर की तरह ही है यानि यह भी सब कुछ देख सकता है, सूंघ सकता है, खा सकता है, चल सकता है, बोल सकता है आदि. परन्तु इसके लिए कोई दीवार नहीं है यह सब जगह आ जा सकता है क्योंकि मन का संकल्प ही इसका स्वरुप है. तीसरा शरीर कारण शरीर है इसमें शरीर की वासना के बीज विद्यमान होते हैं. मृत्यु के बाद यही कारण शरीर एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाता है और इसी के प्रकाश से पुनः मनोमय व स्थूल शरीर की प्राप्ति होती है अर्थात नया जन्म होता है. इसी कारण शरीर से कई सिद्ध योगी परकाय प्रवेश में समर्थ हो जाते हैं.

ध्यान में होने वाले अनुभव – भाग २

५. दो शरीरों का अनुभव होना :-

अनाहत चक्र (हृदय में स्थित चक्र) के जाग्रत होने पर, स्थूल शरीर में अहम भावना का नाश होने पर दो शरीरों का अनुभव होता ही है. कई बार साधकों को लगता है जैसे उनके शरीर के छिद्रों से गर्म वायु निकर्लर एक स्थान पर एकत्र हुई और एक शरीर का रूप धारण कर लिया जो बहुत शक्तिशाली है. उस समय यह स्थूल शरीर जड़ पदार्थ की भांति क्रियाहीन हो जाता है. इस दूसरे शरीर को सूक्ष्म शरीर या मनोमय शरीर कहते हैं. कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सूक्ष्म शरीर हवा में तैर रहा है और वह शरीर हमारे स्थूल शरीर की नाभी से एक पतले तंतु से जुड़ा हुआ है.

कभी ऐसा भी अनुभव अनुभव हो सकता है कि यह सूक्ष्म शरीर हमारे स्थूल शरीर से बाहर निकल गया मतलब जीवात्मा हमारे शरीर से बाहर निकल गई और अब स्थूल शरीर नहीं रहेगा, उसकी मृत्यु हो जायेगी. ऐसा विचार आते ही हम उस सूक्ष्म शरीर को वापस स्थूल शरीर में लाने की कोशिश करते हैं परन्तु यह बहुत मुश्किल कार्य मालूम देता है. “स्थूल शरीर मैं ही हूँ” ऐसी भावना करने से व ईश्वर का स्मरण करने से वह सूक्ष्म शरीर शीघ्र ही स्थूल शरीर में पुनः प्रवेश कर जाता है. कई बार संतों की कथाओं में हम सुनते हैं कि वे संत एक साथ एक ही समय दो जगह देखे गए हैं, ऐसा उस सूक्ष्म शरीर के द्वारा ही संभव होता है. उस सूक्ष्म शरीर के लिए कोई आवरण-बाधा नहीं है, वह सब जगह आ जा सकता है.

६. दिव्य ज्योति दिखना :-

सूर्य के सामान दिव्य तेज का पुंज या दिव्य ज्योति दिखाई देना एक सामान्य अनुभव है. यह कुण्डलिनी जागने व परमात्मा के अत्यंत निकट पहुँच जाने पर होता है. उस तेज को सहन करना कठिन होता है. लगता है कि आँखें चौंधिया गईं हैं और इसका अभ्यास न होने से ध्यान भंग हो जाता है. वह तेज पुंज आत्मा व उसका प्रकाश है. इसको देखने का नित्य अभ्यास करना चाहिए. समाधि के निकट पहुँच जाने पर ही इसका अनुभव होता है.

७. ध्यान में कभी ऐसे लगता है जैसे पूरी पृथ्वी गोद में रखी हुई है या शरीर की लम्बाई बदती जा रही है और अनंत हो गई है, या शरीर के नीचे का हिस्सा लम्बा होता जा रहा है और पूरी पृथ्वी में व्याप्त हो गया है, शरीर के कुछ अंग जैसे गर्दन का पूरा पीछे की और घूम जाना, शरीर का रूई की तरह हल्का लगना, ये सब ध्यान के समय कुण्डलिनी जागरण के कारण अलग-अलग चक्रों की प्रतिभाएं प्रकट होने के कारण होता है. परन्तु साधक को इनका उपयोग नहीं करना चाहिए, केवल परमात्मा की प्राप्ति को ही लक्ष्य मानकर ध्यान करते रहना चाहिए. इन प्रतिभाओं पर ध्यान न देने से ये पुनः अंतर्मुखी हो जाती हैं.

८. कभी-कभी साधक का पूरा का पूरा शरीर एक दिशा विशेष में घूम जाता है या एक दिशा विशेष में ही मुंह करके बैठने पर ही बहुत अच्छा ध्यान लगता है अन्य किसी दिशा में नहीं लगता. यदि अन्य किसी दिशा में मुंह करके बैठें भी, तो शरीर ध्यान में अपने आप उस दिशा विशेष में घूम जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आपके ईष्ट देव या गुरु का निवास उस दिशा में होता है जहाँ से वे आपको सन्देश भेजते हैं. कभी-कभी किसी मंत्र विशेष का जप करते हुए भी ऐसा महसूस हो सकता है क्योंकि उस मंत्र देवता का निवास उस दिशा में होता है, और मंत्र जप से उत्पन्न तरंगें उस देवता तक उसी दिशा में प्रवाहित होती हैं, फिर वहां एकत्र होकर पुष्ट (प्रबल) हो जाती हैं और इसी से उस दिशा में खिंचाव महसूस होता है.

९. संसार (दृश्य) व शरीर का अत्यंत अभाव का अनुभव :-

साधना की उच्च स्थिति में ध्यान जब सहस्रार चक्र पर या शरीर के बाहर स्थित चक्रों में लगता है तो इस संसार (दृश्य) व शरीर के अत्यंत अभाव का अनुभव होता है. यानी एक शून्य का सा अनुभव होता है. उस समय हम संसार को पूरी तरह भूल जाते हैं (ठीक वैसे ही जैसे सोते समय भूल जाते हैं). सामान्यतया इस अनुभव के बाद जब साधक का चित्त वापस नीचे लौटता है तो वह पुनः संसार को देखकर घबरा जाता है, क्योंकि उसे यह ज्ञान नहीं होता कि उसने यह क्या देखा है?

वास्तव में इसे आत्मबोध कहते हैं. यह समाधि की ही प्रारम्भिक अवस्था है अतः साधक घबराएं नहीं, बल्कि धीरे-धीरे इसका अभ्यास करें. यहाँ अभी द्वैत भाव शेष रहता है व साधक के मन में एक द्वंद्व पैदा होता है. वह दो नावों में पैर रखने जैसी स्थिति में होता है, इस संसार को पूरी तरह अभी छोड़ा नहीं और परमात्मा की प्राप्ति अभी हुई नहीं जो कि उसे अभीष्ट है. इस स्थिति में आकर सांसारिक कार्य करने से उसे बहुत क्लेश होता है क्योंकि वह परवैराग्य को प्राप्त हो चुका होता है और भोग उसे रोग के सामान लगते हैं, परन्तु समाधी का अभी पूर्ण अभ्यास नहीं है.

इसलिए साधक को चाहिए कि वह धैर्य रखें व धीरे-धीरे समाधी का अभ्यास करता रहे और यथासंभव सांसारिक कार्यों को भी यह मानकर कि गुण ही गुणों में बारात रहे हैं, करता रहे और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखे. साथ ही इस समय उसे तत्त्वज्ञान की भी आवश्यकता होती है जिससे उसके मन के समस्त द्वंद्व शीघ्र शांत हो जाएँ. इसके लिए योगवाशिष्ठ (महारामायण) नामक ग्रन्थ का विशेष रूप से अध्ययन व अभ्यास करें. उमें बताई गई युक्तियों “जिस प्रकार समुद्र में जल ही तरंग है, सुवर्ण ही कड़ा/कुंडल है, मिट्टी ही मिट्टी की सेना है, ठीक उसी प्रकार ईश्वर ही यह जगत है.” का बारम्बार चिंतन करता रहे तो उसे शीघ्र ही परमत्मबोध होता है, सारा संसार ईश्वर का रूप प्रतीत होने लगता है और मन पूर्ण शांत हो जाता है.

१०. चलते-फिरते उठते बैठते यह महसूस होना कि सब कुछ रुका हुआ है, शांत है, “मैं नहीं चल रहा हूँ, यह शरीर चल रहा है”, यह सब आत्मबोध के लक्षण हैं यानि परमात्मा के अत्यंत निकट पहुँच जाने पर यह अनुभव होता है.

११. कई साधकों को किसी व्यक्ति की केवल आवाज सुनकर उसका चेहरा, रंग, कद, आदि का प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है और जब वह व्यक्ति सामने आता है तो वह साधक कह उठता है कि, “अरे! यही चेहरा, यही कद-काठी तो मैंने आवाज सुनकर देखी थी, यह कैसे संभव हुआ कि मैं उसे देख सका?” वास्तव में धारणा के प्रबल होने से, जिस व्यक्ति की ध्वनि सुनी है, साधक का मन या चित्त उस व्यक्ति की भावना का अनुसरण करता हुआ उस तक पहुँचता है और उस व्यक्ति का चित्र प्रतिक्रिया रूप उसके मन पर अंकित हो जाता है. इसे दिव्या दर्शन भी कहते हैं.

१२. आँखें बंद होने पर भी बाहर का सब कुछ दिखाई देना, दीवार-दरवाजे आदि के पार भी देख सकना, बहुत दूर स्थित जगहों को भी देख लेना, भूत-भविष्य की घटनाओं को भी देख लेना, यह सब आज्ञा चक्र (तीसरी आँख) के खुलने पर अनुभव होता है.

१३.  अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के मन की बात जान लेना या दूर स्थित व्यक्ति क्या कर रहा है (दु:खी है, रो रहा है, आनंद मना रहा है, हमें याद कर रहा है, कही जा रहा है या आ रहा है वगैरह) इसका अभ्यास हो जाना और सत्यता जांचने के लिए उस व्यक्ति से उस समय बात करने पर उस आभास का सही निकलना, यह सब दूसरों के साथ अपने चित्त को जोड़ देने पर होता है. यह साधना में बाधा उत्पन्न करने वाला है क्र्योकि दूसरों के द्वारा इस प्रकार साधक का मन अपनी और खींचा जाता है और ईश्वर प्राप्ति के अभ्यास के लिए कम समय मिलता है और अभय कम हो पाता है जिससे साधना दीरे-धीरे क्षीण हो जाती है. इसलिए इससे बचना चाहिए. दूसरों के विषय में सोचना छोड़ें. अपनी साधना की और ध्यान दें. इससे कुछ ही दिनों में यह प्रतिभा अंतर्मुखी हो जाती है और साधना पुनः आगे बदती है.

१४. ईश्वर के सगुण स्वरुप का दर्शन :-

ईश्वर के सगुण रूप की साधना करने वाले साधानकों को, भगवान का वह रूप कभी आँख वंद करने या कभी बिना आँख बंद किये यानी खुली आँखों से भी दिखाई देने का आभास सा होने लगता है या स्पष्ट दिखाई देने लगता है. उस समय उनको असीम आनंद की प्राप्ति होती है. परन्तु मन में यह विश्वास नहीं होता कि ईश्वर के दर्शन किये हैं. वास्तव में यह सवितर्क समाधि की सी स्थिति है जिसमे ईश्वर का नाम, रूप और गुण उपस्थित होते हैं. ऋषि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में इसे सवितर्क समाधि कहा है. ईश्वर की कृपा होने पर (ईष्ट देव का सान्निध्य प्राप्त होने पर) वे साधक के पापों को नष्ट करने के लिए इस प्रकार चित्त में आत्मभाव से उपस्थित होकर दर्शन देते हैं और साधक को अज्ञान के अन्धकार से ज्ञान के प्रकाश की और खींचते हैं. इसमें ईश्वर द्वारा भक्त पर शक्तिपात भी किया जाता है जिससे उसे परमानन्द की अनुभूति होती है. कई साधकों/भक्तों को भगवान् के मंदिरों या उन मंदिरों की मूर्तियों के दर्शन से भी ऐसा आनंद प्राप्त होता है. ईष्ट प्रबल होने पर ऐसा होता है. यह ईश्वर के सगुन स्वरुप के साक्षात्कार की ही अवस्था है इसमें साधक कोई संदेह न करें.

१५. कई सगुण साधक ईश्वर के सगुन स्वरुप को उपरोक्त प्रकार से देखते भी हैं और उनसे वार्ता भी करने का प्रयास करते हैं. इष्ट प्रबल होने पर वे बातचीत में किये गए प्रश्नों का उत्तर प्रदान करते हैं, या किसी सांसारिक युक्ति द्वारा साधक के प्रश्न का हल उपस्थित कर देते हैं. यह ईष्ट देव की निकटता व कृपा प्राप्त होने पर होता है. इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए. साधना में आने वाले विघ्नों को अवश्य ही ईश्वर से कहना चाहिए और उनसे सदा मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करते रहना चाहिए. वे तो हमें सदा राह दिखने के लिए ही तत्पर हैं परन्तु हम ही उनसे राह नहीं पूछते हैं या वे मार्ग दिखाते हैं तो हम उसे मानते नहीं हैं, तो उसमें ईश्वर का क्या दोष है? ईश्वर तो सदा सबका कल्याण ही चाहते हैं.

ध्यान में होने वाले अनुभव – भाग ३

१६. शक्तिपात :-

हमारे गुरु या ईष्ट देव हम पर समयानुसार शक्तिपात भी करते रहते हैं. उस समय हमें ऐसा लगता है जैसे मूर्छा (बेहोशी) सी आ रही है या अचानक आँखें बंद होकर गहन ध्यान या समाधि की सी स्थिति हो जाती है, साथ ही एक दिव्य तेज का अनुभव होता है और परमानंद का अनुभव बहुत देर तक होता रहता है. ऐसा भी लगता है जैसे कोई दिव्या धारा इस तेज पुंज से निकलकर अपनी और बह रही हो व अपने अपने भीतर प्रवेश कर रही हो. वह आनंद वर्णनातीत होता है. इसे शक्तिपात कहते है.

जब गुरु सामने बैठकर शक्तिपात करते हैं तो ऐसा लगता है की उनकी और देखना कठिन हो रहा है. उनके मुखमंडल व शरीर के चारों तरफ दिव्य तेज/प्रकाश दिखाई देने लगता है और नींद सी आने लगती है और शरीर एकदम हल्का महसूस होता है व परमानन्द का अनुभव होता है. इस प्रकार शक्तिपात के द्वारा गुरु पूर्व के पापों को नष्ट करते हैं व कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करते हैं.

ध्यान/समाधी की उच्च अवस्था में पहुँच जाने पर ईष्ट देव या ईश्वर द्वारा शक्तिपात का अनुभव होता है. साधक को एक घूमता हुआ सफ़ेद चक्र या एक तेज पुंज आकाश में या कमरे की छत पर दीख पड़ता है और उसके होने मात्र से ही परमानन्द का अनुभव ह्रदय में होने लगता है. उस समय शारीर जड़ सा हो जाता है व उस चक्र या पुंज से सफ़ेद किरणों का प्रवाह निकलता हुआ अपने शरीर के भीतर प्रवेश करता हुआ प्रतीत होता है. उस अवस्था में बिजली के हलके झटके लगने जैसा अनुभव भी होता है और उस झटके के प्रभाव से शरीर के अंगा भी फड़कते हुए देखे जाते हैं.

यदि ऐसे अनुभव होते हों तो समझ लेना चाहिए कि आप पर ईष्ट या गुरु की पूर्ण कृपा हो गई है, उनहोंने आपका हाथ पकड़ लिया है और वे शीघ्र ही आपको इस माया से बाहर खींच लेंगे.

१७. अश्विनी मुद्रा, मूल बांध का लगना :-

श्वास सामान्य चलना और गुदा द्वार को बार-बार संकुचित करके बंद करना व फिर छोड़ देना. या श्वास भीतर भरकर रोक लेना और गुदा द्वार को बंद कर लेना, जितनी देर सांस भीतर रुक सके रोकना और उतनी देर तक गुदा द्वार बंद रखना और फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए गुदा द्वार खोल देना इसे अश्विनी मुद्रा कहते हैं. कई साधक इसे अनजाने में करते रहते हैं और इसको करने से उन्हें दिव्य शक्ति या आनंद का अनुभव भी होता है परन्तु वे ये नहीं जानते कि वे एक यौगिक क्रिया कर रहे हैं.

अश्विनी मुद्रा का अर्थ है “अश्व यानि घोड़े की तरह करना”. घोडा अपने गुदा द्वार को खोलता बंद करता रहता है और इसी से अपने भीतर अन्य सभी प्राणियों से अधिक शक्ति उत्पन्न करता है. इस अश्विनी मुद्रा को करने से कुण्डलिनी शक्ति शीघ्रातिशीघ्र जाग्रत होती है और ऊपर की और उठकर उच्च केन्द्रों को जाग्रत करती है. यह मुद्रा समस्त रोगों का नाश करती हैं. विशेष रूप से शरीर के निचले हिस्सों के सब रोग शांत हो जाते हैं. स्त्रियों को प्रसव पीड़ा का भी अनुभव नहीं होता.

प्रत्येक नए साधक को या जिनकी साधना रुक गई है उनको यह अश्विनी मुद्रा अवश्य करनी चाहिए. इसको करने से शरीर में गरमी का अनुभव भी हो सकता है, उस समय इसे कम करें या धीरे-धीरे करें व साथ में प्राणायाम भी करें. सर्दी में इसे करने से ठण्ड नहीं लगती. मन एकाग्र होता है. साधक को चाहिए कि वह सब अवस्थाओं में इस अश्विनी मुद्रा को अवश्य करता रहे. जितना अधिक इसका अभ्यास किया जाता है उतनी ही शक्ति बदती जाती है. इस क्रिया को करने से प्राण का क्षय नहीं होता और इस प्राण उर्जा का उपयोग साधना की उच्च अवस्थाओं की प्राप्ति के लिए या विशेष योग साधनों के लिए किया जा सकता है.

मूल बांध इस अश्विनी मुद्रा से मिलती-जुलती प्रक्रिया है. इसमें गुदा द्वार को सिकोड़कर बंद करके भीतर – ऊपर की और खींचा जाता है. यह वीर्य को ऊपर की और भेजता है एवं इसके द्वारा वीर्य की रक्षा होती है. यह भी कुंडलिनी जागरण व अपानवायु पर विजय का उत्तम साधन है. इस प्रकार की दोनों क्रियाएं स्वतः हो सकती हैं. इन्हें अवश्य करें. ये साधना में प्रगति प्रदान करती हैं.

१८. गुरु या ईष्ट देव की प्रबलता :-

जब गुरु या ईष्ट देव की कृपा हो तो वे साधक को कई प्रकार से प्रेरित करते हैं. अन्तःकरण में किसी मंत्र का स्वतः उत्पन्न होना व इस मंत्र का स्वतः मन में जप आरम्भ हो जाना, किसी स्थान विशेष की और मन का खींचना और उस स्थान पर स्वतः पहुँच जाना और मन का शांत हो जाना, अपने मन के प्रश्नों के समाधान पाने के लिए प्रयत्न करते समय अचानक साधू पुरुषों का मिलना या अचानक ग्रन्थ विशेषों का प्राप्त होना और उनमें वही प्रश्न व उसका उत्तर मिलना, कोई व्रत या उपवास स्वतः हो जाना, स्वप्न के द्वारा आगे घटित होने वाली घटनाओं का संकेत प्राप्त होना व समय आने पर उनका घटित हो जाना, किसी घोर समस्या का उपाय अचानक दिव्य घटना के रूप में प्रकट हो जाना, यह सब होने पर साधक को आश्चर्य, रोमांच व आनंद का अनुभव होता है. वह सोचने लगता है की मेरे जीवन में दिव्य घटनाएं घटित होने लगी हैं, अवश्य ही मेरे इस जीवन का कोई न कोई विशेष उद्देश्य है, परन्तु वह क्या है यह वो नहीं समझ पाटा. किन्तु साधक धैर्य रखे आगे बढ़ता रहे, क्योंकि ईष्ट या गुरु कृपा तो प्राप्त है ही, इसमें संदेह न रखे; क्योंकि समय आने पर वह उद्देश्य अवश्य ही उसके सामने प्रकट हो जाएगा.

१९. ईष्ट भ्रष्टता का भ्रम :-

कई बार साधकों को ईष्ट भ्रष्टता का भ्रम उपस्थित हो जाता है. उदाहरण के लिए कोई साधक गणेशजी को इष्ट देव मानकर उपासना आरम्भ करता है. बहुत समय तक उसकी आराधना अच्छी चलती है, परन्तु अचानक कोई विघ्न आ जाता है जिससे साधना कम या बंद होने लगती है. तब साधक विद्वानों, ब्राह्मणों से उपाय पूछता है, तो वे जन्मकुंडली आदि के माध्यम से उसे किसी अन्य देव (विष्णु आदि) की उप्पसना के लिए कहते हैं. कुछ दिन वह उनकी उपासना करता है परन्तु उसमें मन नहीं लगता. तब फिर वह और किसी की पास जाता है. वह उसे और ही किसी दुसरे देव-देवी आदि की उपासना करने के लिए कहता है. तब साधक को यह लगता है की मैं अपने ईष्ट गणेशजी से भ्रष्ट हो रहा हूँ. इससे न तो गणेशजी ही मिलेंगे और न ही दूसरे देवता और मैं साधना से गिर जाऊँगा.

यहाँ साधकों से निवेदन है की यह सही है की वे अपने ईष्ट देव का ध्यान-पूजन बिलकुल नहीं छोड़ें, परन्तु वे उनके साथ ही उन अन्य देवताओं की भी उपासना करें. साधना के विघ्नों की शांति के लिए यह आवश्यक हो जाता है. उपासना से यहाँ अर्थ उन-उन देवी देवताओं के विषय में जानना भी है क्योंकि उन्हें जानने पर हम यह पाते हैं की वस्तुतः वे एक ही ईश्वर के अनेक रूप हैं (जैसे पानी ही लहर, बुलबुला, भंवर, बादल, ओला, बर्फ आदि है). इस प्रकार ईष्ट देव यह चाहता है कि साधक यह जाने. इसलिए इसे ईष्ट भ्रष्टता नहीं बल्कि ईष्ट का प्रसार कहना चाहिए.

ध्यान में होने वाले अनुभव – भाग ४

२०. शरीर का हल्का लगना :-

जब साधक का ध्यान उच्च केन्द्रों (आज्ञा चक्र, सहस्रार चक्र) में लगने लगता है तो साधक को अपना शरीर रूई की तरह बहुत हल्का लगने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब तक ध्यान नीचे के केन्द्रों में रहता है (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर चक्र तक), तब तक “मैं यह स्थूल शरीर हूँ” ऐसी दृढ भावना हमारे मन में रहती है और यह स्थूल शरीर ही भार से युक्त है, इसलिए सदा अपने भार का अनुभव होता रहता है. परन्तु उच्च केन्द्रों में ध्यान लगने से “मैं शरीर हूँ” ऐसी भावना नहीं रहती बल्कि “मैं सूक्ष्म शरीर हूँ” या “मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ परमात्मा का अंश हूँ” ऎसी भावना दृढ हो जाती है. यानि सूक्ष्म शरीर या आत्मा में दृढ स्थिति हो जाने से भारहीनता का अनुभव होता है. दूसरी बात यह है कि उच्च केन्द्रों में ध्यान लगने से कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है जो ऊपर की और उठती है. यह दिव्य शक्ति शरीर में अहम् भावना यानी “मैं शरीर हूँ” इस भावना का नाश करती है, जिससे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल का भान होना कम हो जाता है. ध्यान की उच्च अवस्था में या शरीर में हलकी चीजों जैसे रूई, आकाश आदि की भावना करने से आकाश में चलने या उड़ने की शक्ति आ जाती है, ऐसे साधक जब ध्यान करते हैं तो उनका शरीर भूमि से कुछ ऊपर उठ जाता है. परन्तु यह सिद्धि मात्र है, इसका वैराग्य करना चाहिए.

२१. हाथ के स्पर्श के बिना केवल दूर से ही वस्तुओं का खिसक जाना :-

कई बार साधकों को ऐसा अनुभव होता है कि वे किसी हलकी वास्तु को उठाने के लिए जैसे ही अपना हाथ उसके पास ले जाते हैं तो वह वास्तु खिसक कर दूर चली जाती है, उस समय साधक को अपनी अँगुलियों में स्पंदन (झन-झन) का सा अनुभव होता है. साधक आश्चर्यचकित होकर बार-बार इसे करके देखता है, वह परीक्षण करने लगता है कि देखें यह दुबारा भी होता है क्या. और फिर वही घटना घटित होती है. तब साधक यह सोचता है कि अवश्य ही यह कोई दिव्य घटना उसके साथ घटित हो रही है. वास्तव में यह साधक के शरीर में दिव्य उर्जा (कुंडलिनी, मंत्र जप, नाम जप आदि से उत्पन्न उर्जा) के अधिक प्रवाह के कारण होता है. वह दिव्य उर्जा जब अँगुलियों के आगे एकत्र होकर घनीभूत होती है तब इस प्रकार की घटना घटित हो जाती है.

२२. रोगी के रुग्ण भाग पर हाथ रखने से उसका स्वस्थ होना :-

कई बार साधकों को ऐसा अनुभव होता है कि वे अनजाने में किसी रोगी व्यक्ति के रोग वाले अंग पर कुछ समय तक हाथ रखते हैं और वह रोग नष्ट हो जाता है. तब सभी लोग इसे आश्चर्य की तरह देखते हैं. वास्तव में यह साधक के शरीर से प्रवाहित होने वाली दिव्य उर्जा के प्रभाव से होता है. रोग का अर्थ है उर्जा के प्रवाह में बाधा उत्पन्न हो जाना. साधक के संपर्क से रोगी की वह रुकी हुई उर्जा पुनः प्रवाहित होने लगती है, और वह स्वस्थ हो जाता है. मंत्र शक्ति व रेकी चिकित्सा पद्धति का भी यही आधार है कि मंत्र एवं भावना व ध्यान द्वारा रोगी की उर्जा के प्रवाह को संतुलित करने की तीव्र भावना करना.

आप अपने हाथ की अंजलि बनाकर उल्टा करके अपने या अन्य व्यक्ति के शरीर के किसी भाग पर बिना स्पर्श के थोडा ऊपर रखें. फिर किसी मंत्र का जप करते हुए अपनी अंजलि के नीचे के स्थान पर ध्यान केन्द्रित करें और ऐसी भावना करें कि मंत्र जप से उत्पन्न उर्जा दुसरे व्यक्ति के शरीर में जा रही है. कुछ ही देर में आपको कुछ झन झन या गरमी का अनुभव उस स्थान पर होगा. इसे ही दिव्य उर्जा कहते हैं. यह मंत्र जाग्रति का लक्षण है.

२३. अंग फड़कना :-

शिव पुराण के अनुसार यदि सात या अधिक दिन तक बांयें अंग लगातार फड़कते रहें तो मृत्यु योग या मारक प्रयोग (अभिचारक प्रयोग) हुआ मानना चाहिए. कोई बड़ी दुर्घटना या बड़ी कठिन समस्या का भी यह सूचक है. इसके लिए पहले कहे गए उपाय करें (देखें विघ्न सूचक स्वप्नों के उपाय). इसके अतिरिक्त काली की उपासना करें. दुर्गा सप्तशती में वर्णित रात्रिसूक्तम व देवी कवच का पाठ करें. मान काली से रक्षार्थ प्रार्थना करें.

दांयें अंग फड़कने पर शुभ घटना घटित होती है, साधना में सफलता प्राप्त होती है. यदि बांया व दांया दोनों अंग एक साथ फडकें तो समझना चाहिए कि विपत्ति आयेगी परन्तु ईश्वर की कृपा से बहुत थोड़े से नुक्सान में ही टल जायेगी. एक और संकेत यह भी है कि कोई पूर्वजन्म के पापों के नाश का समय है इसलिए वे पाप के फल प्रकट तो होंगे किन्तु ईश्वर की कृपा से कोई विशेष हानि नहीं कर पायेंगे. इसके अतिरिक्त यह साधक के कल्याण के लिए ईश्वर के द्वारा बनाई गई योजना का भी संकेत है.

२४. गुरु/ईष्ट के परकाय प्रवेश द्वारा साधक को परमात्मबोध की प्राप्ति :-

गुरु या ईष्ट देव अपने सूक्ष्म शरीर से साधक के शरीर में प्रवेश करते हैं और उसे प्रबुद्ध करते हैं. प्रारम्भ में साधक को यह महसूस होता है कि आसपास कोई है जो अदृश्य रूप से उसके साथ साथ चलता है. कभी कोई सुगंध, कभी कोई स्पर्श, कभी कोई ध्वनि सुनाई दे सकती है, जिसका पता आसपास के किसी आदमी को नहीं लगेगा, उनका कोई वास्तविक कारण प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देगा. इसके बाद जब यह अभ्यास दृढ हो जाता है तो शरीर का कोई अंग तेजी से अपने आप हिलना, रोकने की कोशिश करने पर भी नहीं रुकना और उस समय एक आनंद बना रहना, इस प्रकार के अनुभव होते हैं. तब साधक यह सोचता है कि यह क्या है? कहीं साधना में कुछ गलत तो नहीं हो रहा. यह किसी दैवीय शक्ति का प्रभाव है या आसुरी शक्ति का? तो इसका उत्तर है कि यदि दांया अंग हिले तो समझना चाहिए कि दैवीय शक्ति का प्रभाव है और यदि बांया अंग हिले तो समझना चाहिए कि आसुरी शक्ति का प्रभाव है और वह शरीर में प्रवेश करना चाहती है. साथ ही यदि एक आनंद बना रहे तो समझें कि दैवीय शक्ति प्रवेश करना चाहती है. किन्तु यदि क्रोध से आँखें लाल हो जाएँ, मन में बेचैनी जैसी हो तो समझना चाहिए कि आसुरी शक्ति है. इस प्रकार जब पहचान हो जाए तो यदि आसुरी शक्ति हो तो उसे बलपूर्वक रोकना चाहिए. इसके लिए भगवान् व गुरु से प्रार्थना करें कि वह इस आसुरी शक्ति से हमारी रक्षा करें व उसे सदा के लिए हमसे दूर हटा दें. यदि दैवीय शक्ति है तो आपको प्रयत्न करने पर शीघ्र ही यह पता लग जाएगा कि वे कौन हैं और आगे आपको क्या करना चाहिए.

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105 Comments

  1. June 8, 2011 at 10:45 pm

    Good

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  2. utkarsh verma said,

    March 27, 2012 at 10:02 pm

    thank a lot !!!!!!!!

    jai osho

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    • oshoisyours said,

      August 9, 2012 at 4:45 am

      Use Daily this meditation method You will see new supernaturanal powers with u

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  3. mack said,

    March 30, 2012 at 12:31 pm

    This Video is very useful to How to meditate begining. I like it

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  4. Sushil Yadav said,

    March 10, 2013 at 9:52 am

    Attended O S H O Dhyan Shivir realy nice and calming

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  5. Ramandeep said,

    April 26, 2013 at 11:13 am

    thanks a lot sir please mail this video on my mail id i am vary thankful to you for this act of kindness .

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  6. yogesh said,

    March 7, 2015 at 3:10 am

    Nice

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  7. M.L ROHIT said,

    April 14, 2015 at 5:39 am

    Very Good

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  8. Rashi gupta said,

    April 17, 2015 at 2:54 am

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  9. rajkumar saini said,

    September 2, 2015 at 10:39 am

    सत्य बिलकुल सत्य

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  10. manav said,

    October 15, 2015 at 4:42 pm

    good

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  11. Rajesh said,

    October 22, 2015 at 8:24 pm

    nice information about hidden knowledge of dhyan, thanks a lot.

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  12. vijay said,

    January 2, 2016 at 7:44 pm

    pero me jhunjhuni ka kya upaay he is se bada pareshan hu

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    • January 3, 2016 at 9:48 pm

      Vijay ji thoda vistaar me apni problem ko bataye me zarur consult karke aapki help karne ki kosis karunga. aapki age/ aur ye kabse hai/sardiyo me hota hai yaa garimo me yaa harwaqt rehta hai/ first time kab hua reason sab bataye tab shayd kuch kosis ho sake .

      Dhnywaad

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  13. rajesh said,

    January 22, 2016 at 4:28 am

    Nice

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  14. Swapnil said,

    February 3, 2016 at 10:23 am

    Very good information… about meditation..

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  15. Saurabh Gupta said,

    April 30, 2016 at 8:56 am

    Good one

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  16. Amar said,

    May 14, 2016 at 12:40 pm

    Amarsinghdhaker01@gmail.com
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  17. anantmyaka said,

    June 7, 2016 at 6:49 am

    Bahot acche guruji!

    Thank You!!

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  18. Aruna said,

    June 17, 2016 at 8:05 pm

    Thanks.

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  19. Subhas Patra said,

    July 5, 2016 at 2:38 am

    बहुत बहुत अच्छा जानकारि

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  20. July 19, 2016 at 10:32 pm

    Awesome

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  21. Minu said,

    August 4, 2016 at 2:17 am

    It’s very useful tips for meditation

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  22. October 9, 2016 at 2:39 am

    I am doing meditation from long time(about 6 years). I do some exercise about 30 minutes in a park. After that I do pranayam & after that i try to focus between my eyebrows with ohm chanting. I am doing it without any guru. I feel good, but didn’t experience anything. Also I plugged ear phone and listen to some siv bhazans. Am I doing right?

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    • October 12, 2016 at 3:43 am

      Sunny Ji Sukriya is blog ko padne k liye. Jesa ki aapne bataya ki 6 yr se meditation kr rhe hai aapko acha bhi feel hota hai, but aapko kisi cheez ki anubhuti nai hui hai. Dhyaan me thoda badlaav kiziye. Aap park me jaate hai 30 mint k liye prayam karte hai exercise krte hai fir dhyan krte hai. yaani 15mint exercise 10 mint pranayam aur 5 mint Dhyaan, Aaab roj 5 mint k dhyaan se kuch hone wala nai hai. Aapko time badana hoga. 30mint hai aapke pass ok. Aaap ek kaam kare park me jaate hai running kare aur tb tk kare jab tk thakk na jaaye aur naa doda jaaye aur fir turant saaf zagh dekh kar ghaas par late jaaye. aur kuch nai japna hai naa om na kuch Bus apni dono boho k beech yaani third aayi ki trf dhyaan de. tb tk lete rhe jab tk lge k aab body ki takkan uttar gyi hai. Ye kare fir bataye k baaki dino me isme kyaa anter dikhaa.

      Dhnywaad.

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  23. manish said,

    October 14, 2016 at 3:31 am

    I am in depression for the past 9 months unable to do anything.
    my wife along with my 7 year old son shifted to her fathers place.
    trying meditation but unable to stop myself thinking negatively. kindly help

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    • October 14, 2016 at 5:19 am

      Hi, Manish Jiwan isi ka naam hai Jiwan me uttarchaadav aate hai aur kese kese aate hai ye kehna to muskil.Kher Dhyaan ki dunia bilkul alg hai kyuki aapko wo aise jiwan me lejaati hai jhaa sukh aur dukh saman hojaate hai. Meri baate hoskata hai aapko kadvi lage mgr aap kamzor hai aur itni zaldi haar mankar depression me chale gye.Aap apne wife aur bacche ki khussi chahte ho agr wo log aapse alg hokr khuss hai to aap kyu nai?? Mere liye kehna asaan hai aapke liye krna muskil kyuki jiske sath beetti hai whi jaanta hai. Mgr such jo hai wahi aapse keh rha hu. Agr wo aapse door khus hai to unhe rehne de aur is baat se aap khus hone ki kosis kre ki aap unhe khus dekhna chahte the aur wo hai khuss. mgr aap aapni bhi khussi dekhna chahte hai sath me isliye aap dukhi hai. Kher me aapse kahunga aap apne jiwan me meditation k sath sath aur bhi badlav laane ki kosis kre. kisi sanstha ko join krle jisme ashaay logo ki help ki jaati hai ya ashaay bachho ki help ki jatti hai.Gardening kre jha rehte hai aaspass k logo se jude kuch nyaa krne ki kosis kre apne mind ko divert kare.yaad rakhe dukh kbhi khtm nai hote bus khud divert karna padta hai. chlo aab Dhyaan kaa bataye to aap sakriyaa dhyaan krna shuru kre ussse aapko adhik sahayta milegi. Jiwan amulaya hai isse niraash naa hoye.bus raaste nikaalo isse badlne k liye. Zyada kuch aur nai khunga Dhnywaad.

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  24. October 31, 2016 at 11:27 pm

    मूत्र स्थान यों प्रकार से घृणित एवं उपेक्षित स्थान है। पर तत्त्वतः उसकी सामर्थ्य मस्तिष्क में अवस्थित ब्रह्मरंध्र जितनी ही है। वह हमारी सक्रियता का केन्द्र है। यों नाक, कान आदि छिद्र भी मल विसर्जन के लिए प्रयुक्त होते हैं, पर उन्हें कोई ढकता नहीं। मूत्र यन्त्र को ढकने की अनादि एवं आदिम परिपाटी के पीछे वह सतर्कता है, जिसमें यह निर्देश कि इस स्थान से जो अजस्र शक्ति प्रवाह बहता है, उसकी रक्षा की जानी चाहिये। शरीर के अन्य अंगों की तरह यों प्रजनन अवयव भी माँस-मज्जा मात्र से ही बने हैं, पर उनके दर्शन मात्र से मन विचलित हो उठता है। अश्लील चित्र अथवा अश्लील चिन्तन जब मस्तिष्क में उथल-पुथल पैदा कर देता है, तब उन अवयवों का दर्शन यदि भावनात्मक हलचल को उच्छृंखल बनादे तो आश्चर्य ही क्या? यहाँ यह रहस्य जान लेना ही चाहिये। मूत्र संस्थान के मूत में बैठी हुई कुंडलिनी शक्ति प्रसुप्त स्थिति में भी इतनी तीव्र है कि उसकी प्रचण्ड धारायें खुली प्रवाहित नहीं रहने दी जा सकती हैं। उन्हें आवरण में रखने से उनका अपव्यय बचता है और अन्यों के मानसिक संतुलन को क्षति नहीं पहुंचती। छोटे बच्चो को भी कटिबन्ध इसलिये पहनाते हैं। ब्रह्मचारियों को धोती के अतिरिक्त लंगोट भी बाँधे रहना पड़ता है। पहलवान भी ऐसा ही करते हैं। संन्यास और वानप्रस्थ में यही प्रक्रिया अपनानी पड़ती है।
    शिव लिंग के पूजा प्रचलन में एक महान आध्यात्मिक तत्व-ज्ञान का संकेत है, जिसमें व्यक्ति को सचेत किया गया है कि वह शरीर के इस अवयव में ईश्वरीय दिव्यशक्ति का अति उत्कृष्ट अंश समाविष्ट समझे और इस ब्रह्माण्ड को ईश्वर की क्रिया शक्ति-कुण्डलिनी का प्रतीक प्रतिनिधि माने। शिव लिंग का जल अभिषेक करने का तात्पर्य यह भी है कि इस शक्ति के महान आध्यात्मिक लाभों को प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक है कि उसे शीतल रखा जाय, उदीप्त न होने दिया जाय। योगी-यती अपनी साधनाओं में यह तत्वज्ञान संजोये ही रहते हैं कि उन्हें ब्रह्मचर्य पूर्वक रहना चाहिये, ताकि पिण्ड की- देह की- मूलाधार क्रिया शक्ति कुण्डलिनी का अपव्यय न हो और वह बहिर्मुखी होकर अस्त-व्यस्त बनने, उच्छृंखल होने की अपेक्षा लौटकर ऊर्ध्वगामी दिशा पकड़ती हुई ब्रह्मरंध्र अवस्थित महासर्प के साथ तादात्म्य होकर परमानन्द- ब्रह्मानन्द का लक्ष्य प्राप्त कर सके।

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    • November 1, 2016 at 7:38 pm

      तत्व ज्ञान यह है के बर्बरीक नाम का अर्थ है अपने बलकि बारीकीया स्वयं भगवान है। जिसमें भगवान श्री कृष्ण नाम का अर्थ है शरीर मे साढेतीन करोड छिद्र, जिनमे सुदर्शन चक्र चला मतलब सांसो का दर्शन चला, तब जाके आत्मज्ञान हुवा और महाभारत युद्ध मतलब आत्मा शुद्ध कैसे हूवा उसकी जानकारी है कल्याकारी धन्यवाद। हरीने भजता हजु कोईनी लाज जता नथी जाणी रे जेनी सूरता शाहमळियाने साथ वदे वेद वाणी रे, आत्म तत्व चिनह्यो नहि तां लगी सर्व साधना झूठी। शाह सांसे है और मळ शरीरकी अशुद्धि है जो सांसोसे सूरता लगाके आत्मामें ध्यान कर शरीर का मल जिनको निकालना आ गया ऐसे भक्तकी रज मतलब धूल भगवान चाहते है मुझपर उडे तो मै स्वयं परमात्मा ऊसके लिए कुछभी करनेको तत्पर तैयार रहते है। फिर से धन्यवाद बार बार धन्यवाद जो बात समझ में आ जाए तो, सांसोके बलपर बोले सो निहाल सत्त श्री अकाल मृत्यु से परे हम है।

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  25. A P SHARMA said,

    November 19, 2016 at 9:01 am

    Nice

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  26. sarla said,

    November 19, 2016 at 9:27 am

    Dhyan k baad mujhe nind aati h. Me sojati hu. Hr baar koi ladki gate se andar aati h cham cham ki bahut tej awaj k sath or per k pass beth jaati h. Bolti nahi h.. Wo kon h pls btaiye kese puchu wo nahi btati kon h?? Aisa ku hota h pls btaiye

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    • November 21, 2016 at 12:09 am

      Sarla ji Thoda muje aap vistaar me batayenge to me kuch kr paaunga. Please apne bare me thoda bataye, jese kb se dhyaan kr rhe ho. yaa ye ladki wali ghtna kb se horhi hai. us ladki ka chera aapne dekha hai? uske baare me brief kare. aur kb kb kis samay aisa hota hai sab thoda detail me btaye. Hosakta hai aapka koi relation rha ho aur yaa to banana chahti ho. aap detail me ye sab likhe. aur aap married hai? kyaa ye aapne husband ko bataya hai aisa kuch kyaa kabhi unhone mehsus kiya ye sab aap bataye fir dekhte hai ki solution kyaa hoga. Dhnyawaad

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  27. Kundan sadhnani said,

    December 20, 2016 at 12:57 pm

    बहुत ख़ूब ,बिलकुल सही लिखा है । मैं इसमें से कई। बातें रोज़ाना अनुभव करता हुँ।

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  28. sanju singh said,

    December 26, 2016 at 9:41 am

    Nice ….. lakin kya dhyan karne se sansar tyana padta hai .

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  29. sanju singh said,

    December 26, 2016 at 9:45 am

    Kya beech me chodne se koi nuksan hota hai pleas reply …….

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    • December 26, 2016 at 10:23 pm

      Hello Sanju Singh

      Aapne Pucha hai ki kya dhyan karne se sansar tyagna padta hai. Nahi aisa nai hai Sansar nahi tyagna padta balki is sansar me rehkar hi dhyaan krna padta hai bus aapke jivan ko jine k tarike badal jaate hai.Aap dhrsta hojate ho. example jese kisi kaam ko karna hai 2 vykti hai ek bewkoof hai aur dusra samjhdar to jo samjhdaar vykti hai wo us kaam ache se samjh kar kr sakega. aur bewkoof uthal puthal karega. Aab ye manlo k Dhyaan krne se aap samjhdaar ho aur jivan ko kese jina hai ye kala me mahir hojate ho.

      Dusra aapne pucha hai Kya beech me dhyaan chodne se koi nuksan hota hai pleas reply …….

      To me kahunga k han Beech me aap kuch bhi chod do to nuksaan to hoga hee.jese aap jim jaate ho muscle banane bnte bhi hai tite hojate hai lekin aap beech me chod dete ho to kyaa hoga wo fir loose hojayenge jese the. jo fayda hua tha lose hogya. Manlo aapka pet nikla hua hai. aapne mehnat krne running exercise krke pet fit krliya. mgr fir beech me chod kr fir normal routine me aagye to kyaa hoga pet fir badega motapa badega.Aap likhte ho continue mgr aap likhna chod dete ho uske baad fir kaafi time baad likhte ho to likha nai jaata speed kum hojati haath dard krne lgta hai.To kehne ka mtlb hai beech me kuch bhi chodoge to kuch na kuch lose to hoga hee. Aab aate hai Dhyaan pe Aapne dhyaan kiya ek ald disha me turn hue. Jo vichar aapko pareshan krte the unse aap ubr paate hai mind ko relax anubhav krte the.ek alg sa ehsass hota tha lekin aap aab isse chod doge to kya hoga ye waps aajayegi fir wahi normal think hojayegi fir wahi vicharo se ldna wahi pareshaniaa waps hone lagegi.Kisi bhi cheez ko suchaaru roop se chalane k liye uski maintainance bht zaruri hoti hai aur ye to aap jaante hee hai.Example bht hai aap sab jaante hai.Aapke pass bike hai uski time to time service nai karaoge wash nai kroge to wo ek din khraab hojayegi. aap roj nai nahaoge to body me gandgi jama hona shuru hojayegi.Kehne kaa arth hai maintainance/Service chlte rehne chiye jis cheez ko maintain krna ho. nai kroge to khraab hogi. Shyad mere kehne ka mtlb samjh gye honge.

      Me to khunga Dhyaan roj kro Dhyaan me bht kuch hai mera blog pdo:

      https://oshoisyours.wordpress.com/power-of-meditation/

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  30. sanju singh said,

    January 8, 2017 at 9:09 pm

    Hii sir … dhyan karte vakt dono bhoho ke beech me kheecha sa kyo lagta hai iska karan kya hai pls reply…

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    • January 10, 2017 at 2:37 am

      Hello Sanju ye tum jaante hee honge k dono bhoho k beech me aagya chakra hai, yaani 3rd eye. Jab hum dhyaan krte hai to Urja( energy) is chakar par bhi jaati hai isliye aisa yha lagta hai.

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  31. sanju singh said,

    January 10, 2017 at 6:28 am

    Thanks sir

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    • January 10, 2017 at 8:52 pm

      Sanju tum sakriya Dhyaan karo zaldi growth chahte ho to. with in 3 month tumhe result mil jayenge aur with in 15 day result dikhna shuru hojayenge.

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  32. sanju singh said,

    January 13, 2017 at 12:37 am

    Hello sir sakriya dhyan ka kya matlab hota hai detail mai batain sir .

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    • January 16, 2017 at 9:49 pm

      Hello Sanju me thoda busy tha mene sakriya Dhyaan ke bare me comment likha tha me wahi aapko de dunga aap thoda w8 kiziye

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  33. sanju singh said,

    January 13, 2017 at 8:37 am

    Sir mai ek student hu or jab se mai dhyan kar raha hoo mera har kam mai man lagta hai par mai jab study kata hoo to aise lagta hai ki mujhe koi answer yaad nai ho raha dhyan karne se pahle answers yaad rahte the par dhyan karne ke baad mujhe answers yaad kyo nahi rahte iska koi solution batai reply pls..

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  34. sanju singh said,

    January 13, 2017 at 8:40 am

    Sir aaisa koi solution digia jis se dhyan karne ke baad bhi mujhe answer yaad rahe..

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  35. sanju singh said,

    January 13, 2017 at 6:37 pm

    Sir reply pls…(^O^;)

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  36. sanju singh said,

    January 13, 2017 at 11:57 pm

    Sir jaldi se reply kare.

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  37. sanju singh said,

    January 14, 2017 at 9:18 pm

    Sir aab tak aapka reply nahi aya.

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    • Pramod Kumar Pathak said,

      January 15, 2017 at 7:13 am

      शक्ति के अनुसार योग,प्राणायाम के पश्चात् ध्यान। स्मरण शक्ति तो बढता ही है,शारीरिक शक्ति भी बढता है। आत्म विश्वास प्रबल होता है।

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  38. Pramod Kumar Pathak said,

    January 15, 2017 at 7:02 am

    बहुत सुंदर,उपयोगी एवं आनन्ददायक लेख ।

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  39. sanju singh said,

    January 16, 2017 at 7:46 pm

    Pls reply..

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  40. sanju singh said,

    January 16, 2017 at 7:49 pm

    Pls reply..H

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  41. namrata said,

    January 30, 2017 at 4:58 am

    Mai pichle 1 saal se dyan laga rahi hun mujhe kafi anubav hote hain jinka varnan apne kiya hai par ek cheez jo aajkal hoti hai wo mujhe samaj nahi aa rahi ki jab dhyan mai mujhe hum hum ki dwani sunai deti hai yan mmmmmm ki dwani is par mai dyan lagati hun to fir mujhe kuch pata nahi chalta ki aage ka samay kaise gaya aur lagbag 1 hour ke baad mujhe ek jatka sa lagta hai aur unche swar mai mere muh se mera guru mantra (Ram )ucharan hota hai aur mai sachet ho jati hun aub mujhe ye nahi pata chalta ki mai neend mai hu ya jaagi hui par mai seeda baithi hoti hun neend ki tarha nahi hoti ….
    2. Aur kabhi kabhi mujhe swapn bilkul sach ki tarha bhi lagte hain jaise sach mai main kisi se baat kar rahi hun dyan main bethe hua ye bhi kisi kisi din hota hai kripya samjayai

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    • namrata said,

      January 31, 2017 at 5:12 am

      Kindly reply

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    • February 2, 2017 at 2:23 am

      Namrata Ji Aap jo Pucha chahti hai yhi puch sakti hai ye blog meri email Id se hee connect hai.Aapko kuch personal puchna hai to dont worry aap puchiye me approve nahi karunga aur wo public show nai hoga. Aab baat krte hai Aap jiske baare me baat kr rhi hai.

      AAp ek saal se Dhyaan kr rhi hai bhut acchi baat hai.Dhyaan me hmmm huuu yaa aur koi aawaz ka aana normal hai usse pareshaan hone ki zarurat nai.Aur Dhyaan me gehre hone par samay seema khtm hojati hai pata nai chalta 1 ganta kb beeta yaa 1 din kab beeta. Dhyaan me har vykti ke Alg Alg anubhav hote aise anubhav bhi jo aapko google me khojne par bhi nai milenge,Hum kyaa dekhte hai kyaa sochte fir deemag usko kese create krta hai yaa mann kesi partikriya krta hai. Ye sab hum nahi jaante kyu hum log mann ke control me rehte hai aab aap Raam ko mante ho isliye is mantra ka uchharan krne lgte hai.shyad Dhyaan krte hue aap Darte bhi ho yaa jb aise aawaze aati hai to aapke mann me kahi na kahi darr paida hota hai k pata nai ye kyaa horha hai aab to kewal bhagwan bachaaye to aap raam ka naam lete ho.Jese bacche darne par mummy mummy pukarne lgte hai.mgr koi dikkat nahi pareshan na hoiye bhut tarh ki azzeeebo gareeb ghantaaye Dhyaan me hoti hai. aab aapne kaha hai k muje pata nai chalta k neend me jaagi hu yaa nahi Narmata ji Neend me aur Dhyaan bht hee mamuli sa fark hai. Jb hum Dhyaan krte hai aankh band krte hai aab humare sareer ne mann ne bachpan se yhi kiya hai k aankh band krne ka matlab soya jaaye.Mgr aab hum aankh band to krna chahte hai mgr sona nai chahte balki band aankho se kuch dekhna ya khojna chahte hai to sareer aur mann ko time lagta hai.Abb itne saalo ki kriya ko badlna hai time to lagega.

      Dhyaan me cheeze hum apni marzi se dekhna chahte hai band aankho se. Mgr Neend me humara mann deemag hume apni marzi se cheeze dikhaata hai.Aapne pure din me jo dekha aur jo suna wo sara mixture krke sapne me aata hai.Sapno ka Chapter bht bada bada hai unka starr(level) bhi bht bada hai sapno ke bht se parkar hai. aapko aise sapne aate hai k subha uthte he bhul jate hai. kuch aise aate hai k itne gehre k kai din tk nai bhulte.isme wahi mann aur deemag kaam kr rha hota hai.itna kuch hai ke likhne bethunga to naa kitna time lage kher..

      Aab aap dhyaan kr rhi hai alert ho rhi hai apne prti(yaani jaagruk horhi hai)Deemag kese kaam krta hai mann kese kaam krta hai iske uppar aap research kr rhe ho isliye aapko ye sab dikhne lagta hai. Dhyaan me jab bethti hai to kuch pal ke liye neend me chale jaate ho kuch pal ke liye dhyaan me fir kuch pal ke liye neend me to kuch pal k liye dhyaan me idhar udhar idhar udar horhe ho aap he nahi sabhi hote hai ye search hee aise hai. lekin jab keval dhyaan me giroge tb ye sapne hatt jayenge. Kher sawaal bht hai jawaab bhi bht kyuki dhyaan me harpal naya anubhav hota hai.

      me harbar apne blog me is baat pr zor deta hu k Dhyaan krne se zyada Dhyaan ko Saadho yaani Dhyaan ko aapne pal pal me dhaal lo. Sazag rho apne prti.Tb Dhyaan me teji se gatti hoti.

      Aaap muje bataaye k aap Dhyaan kese krte hai shurwat kese krte hai wagarh wagarh…..

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      • February 8, 2017 at 6:04 am

        Narmata Ji jesa aapne likha hai k mene suna hai dyaan me jo bhi ho batana nai chaiye aab jisse suna hai usse ye zarur puchiye ki kyu nai batana chiye, Aisa kuch bhi nai Dhyaan koi raaz rakhne wali cheez nai k bata doge to kuch loss nahi hojayega. me to kehta hu Dhyaan kro aur dusro ko bhi krne ki salah do. AAb baat ye aati hai k Dhyaan me tarkee ho bhi rhi hai yaa nahi, Narmata jab hum kisi bhi kaam ko krte hai to saamne target hota hai.shuru aur aant hota hai mgr Dhyaan me aisa nai hai Dhyaan to anant hai. Baat rhi unnati ki wo dekho jese jese aap Dhyaan me gehre hote rhoge to aap sukh aur dukh k chakkr se duur hone lg jaaoge,Par haan Aap Dhyaan ki sahi vidhi kr rhe ho yaa nahi.Dhyaan krne kaa tarikaa sahi hai k nahi in cheezo par baat krenge. mgr pehele aapke kuch sawal clear karde. Aap geeta ashtawakra pad rhe ho kuch bhi padna jaankari haasil krna aachi baat hai lekin usse padke aise vicharo kaa aana wo glt hai. Duniyaa kesi hai yaa kesi nai aapko kisi bhi nazariye ki koi zarurat nahi ye duniya hai ache aur bure log dono hai yhaa, Aur ye baat bilkul sahi nai hai k bhagwan ander hai.In sawalo se door rhiye duniyaa jesi chl rhi hai chalne de. Dhyaan kaa arth apne ko jaannne se hai naa ki bhagwaan ko ya Dusro ko. kher bhagwan ko bhi jaan lenge mgr phele aapne aap ko to jaan liya jaaye. Aur haan aap bhagwaan ko ek supreme power ki tarh dekhti thi usse aap supreme power he maaniye kum se kum visvass to bana rhega. usse logo me mat dhundiye. Aur bhgwan ko hum par control krne ki zarurat nai hai. Hum khud he apne par control kr sakte hai. aur ye janam janm ka rista jo aapko nazar aata hai ye kaalpnik hai bura naa maane, phele is janam ko to acchi tarh jaane, aapse khud se jude hue hee sawaal itne saare honge k kisi aur ko jaane kaa time hee nai milega, apne upper khoz jaari rakhe.aap ashtawakra k layak hai yaa nai iska faisla na kre ashtawakra ko ek kaahani ki tarh pade aur bhool jaye bus warna Dhyaan me confus hojaoge. Fil haal aap kewal apne upper Dhyaan de apne ko khoje.Duniya ya bhagwan ki tension naa le aap honge to bhi wo honge nai rhoge to bhi wo honge.

        Dhyaan vidhi ke baare me kal me thoda brief me aapse baat krunga. Dhyaan din me 2 time bhi krenge to kaafi ussko pure din kese daalna hai iske baare me bhi me kal aapo brief karunga.Dhynwaad

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  42. vijayanand said,

    March 2, 2017 at 3:32 am

    margdarsan ke lie aabhari hun. boost continue

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  43. karan said,

    March 2, 2017 at 10:38 pm

    jis b mahapursh ne ye post kiya hai mai usse se milna chahata hu kirpya milne ka ya koi sanpark krne ka avsar de .bhut accha post kiya hai sach me …9068906085 Karan Sihag

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    • March 6, 2017 at 9:19 pm

      Karan ji me koi mahapurush nahi hu.Aap logo ki tarah hee hu. Me yhi hu mere sareer se milkar kya karenge. me to khud yhi aapse mil rha hu. Aur bhi post padiye badiya hoga k Dhyaaan shuru kare.

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  44. Namrta Pandey said,

    March 3, 2017 at 3:23 am

    thank you sir
    warm regards
    m student hu or approx 3yrs she room me hi mediation krti hu.7-8 pm me 40-45 mint bjrasan me baith kr aapke post or videos ke vidhi se. sir gine chune bar sun type light kuchh second ke liye dikhta hi rahta h.or v anubhuti as like- body ka hilna ya pura ange frkna,pasina aana. bhau me drd ya halchal type etc.
    sir m 3rd eye activate chahti hu.gyan success meri pahchan ho.kuchh special type power/ awareness ho.
    bs vaha tk pahuchne me meri help kre.plz help me.

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    • March 6, 2017 at 9:23 pm

      Namrta ji me aajkal thoda busy chal rha hu.zaldi hee aapke sampark me rhunga. Jesa me kehta aaya hu Dhyaan krne se Zyada Dhyaan ko Saadhiye. Shubaa Uthne se lekar Raat ko Sone tak Hosh se Har kaam ko kare. 3rd eye activate apne aap hone lagegi jese jese aap apne parti sajag hoyenge.

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  45. Namrta Pandey said,

    March 3, 2017 at 3:36 am

    sir mere koi guru Ji no h.Jo h so aapki post or an aap ho.plz mujhe vaha to pahuchne me help de.

    sir,kya aap saktipat krna pasand krte h.
    mere liye possible ho skta h? plz tell me.

    sir kindly .reply me
    plz…

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    • March 6, 2017 at 9:38 pm

      🙂 Saktipat ke chakkar me mat padiye. Shai Gyaan ko khojiye. Aaap croro saalo se is brahmand me ho. Aaapne itna Gyaan Arjit kiya hoga.Wo sab aapke ander he hai kisi aur guru ki zarurat nai. Tumhare guru tum khud ho.Haan bus thodi Help lo kyuki ye wo andhere ka rasta hai jisme mombati lekar chlo jese jese aage badte rhoge rasta khud he dikhaai dene lagega. AAp Dhyaan ko Shaadiye. Chlo me aapko ek Chota sa practical deta hu.

      Aap ek din karke dekhna fir batana kesa anubav raha. Aapne Sai k baare me pada hoga videos ya movies dekhi hogi unka kesa nature tha aapko knwledge hogi. To aab aapne karna kya hai k Raat ko Sone ke liye jab bed par jaate to ye aaapne maannaa hai k Aaap Khud Sai ho.Aur bilkul aapne wo feelings wo bhaaw krna k bus tum he ho.unke jesa sochna..aur bhi haan kewal bhitri bhaaw. aab ye naa ho ke dusro ko ashirwad dene lag jao aur naa he unke jesi dress pehnlo aur naa he ghr ghr ja kr bheeksa maango.. Kewal aur sirf bhitar se badalna hai apne bhaaw aur ye pura din chalega. Baaki saare kaam jo karte ho wo karna. MGr bolne kaa bhaw change hoga yaani Sai bol rhe hai bht pyaar bht Dyaa bhaaw. Dusre ke bhale k liye sochna etc. Aur is badlaw ko tum khud mehsus karoge. Fir jab isko ache se karlo aur raat ko wapas unhe Dhywaad dete hue apne bhitar aane ka Dhywad kar sojana. Ok Is practical ko karo fir muje batana kesa rha . I hope ye anubhav bht change krdega aapko.

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  46. Seeker said,

    March 3, 2017 at 11:59 am

    I really loved the video and I’ve always wanted to start meditating. And this was very helpful. But I have a question.
    Everything and the whole process of reaching the ultimate goal looks relatively so simple in this video. However, we don’t really see many realised meditators around us. Is it really possible to attain the final goal of liberation in one’s lifetime, especially when the person is not doing fulltime meditation because he/she is an ordinary person busy in making his living?

    And question no. 2~ Is being unrealised/disenlightened and dying like that only so bad?
    Please do reply.
    Thankyou

    Like

    • March 8, 2017 at 9:51 pm

      I really loved the video and I’ve always wanted to start meditating. And this was very helpful. But I have a question.

      Ans : Aapka Bht Bht Dhnywaaad k Apko video pasand aayi aur aachi baat hai k aap Meditation Kare.

      Everything and the whole process of reaching the ultimate goal looks relatively so simple in this video.

      Shyd aap is video ko kuch glt samjh bethe isme tarika bata rakha hai k aise aise Dhyaan kare to Aise aise result aayega.Kehne ka aur batane ka tareeka to simple he hota mgr krne par kuch to kathinaai aayegi hee. maanliziye aapko delhi se Gaziabad jana hai. aab me aapko keh rha hu k ye bus pakd lena fir waha se auto le lena us gali me chale jaana fir waha mud jana bus phuch gye. Abb kehne me kaha dikkat aayi easy tha na. Mgr aab reality me Delhi se Gaziabad gaoge to dikkat to aayegi na.Haan me maanta hu k muskil hai mgr itna bhi muskil nahi kr na sako. Kosis he Kaamyaabi ki tarf lejaati hai. Sidhi aur saral normal bhasha me aaapko reply de rha hu Dharmik yaa professional tarike se nai. Tv me ad aati hai k Maggi 2 mint me teyaar shayd aapne khaayi hogi. 2mint maggi lekin jab banate hai to kyaa 2 mint lgte hai nai na 6 se 7 mint easy lg jaate hai.isliye theory me aur practical me fark to hoga na.

      However, we don’t really see many realised meditators around us.

      Ans :Dusro ko dekhne ki zarurat nai k koi phucha k nai. Aapne apna pet bhrna hai to dusre ko to nai dekhoge k uska pet to bharaa nai to mera bhi nai bharega.10 log dhyaan krte hai jinke pass aaadhi adhuri jaankari hoti hai, Dhyaan krte hai Dhyaan saalo saal chalta hai mgr unhe kuch haasil nai hota. mgr kaha jata hai k haan me to meditation krta hu. Meditation k liye sahi disha ka hona bht zaruri hai.Nai to kitne bhi saal lagalo kuch haasil nai hone wala.

      Is it really possible to attain the final goal of liberation in one’s lifetime, especially when the person is not doing fulltime meditation because he/she is an ordinary person busy in making his living?

      Ans :Baat Possibility ki to chaaye bechne waale modi ji Desh k aaaj pradhan mantri hai. Sab kuch possible hai. aab aapne kaha k person fulltime meditation nai karta ya krti phele to ye bata du Meditation krne k liye full time bethna zaruri nai. Pure din me ek time nikaal lo bht hai. Hardwork se zyada smartwork ki value hai, Dhyaan ko pure din shaado. Jese khusbu mehkaane k liye Din me kewal ek baar perfume lagate hai. mgr khusbu pure din milti hai aisa hee hai dhyaan. Mene Kai logo ko dekha hai parko me Dhyaan krte hue ek baar mene kisi se baat bhi ki mene dekha ek vyakti park me dhyaan kr rhe the aankh band krke aur kuch kuch dher me aankh kholte idhar udhar dekhte fir aankh band krlete aaab aadhe gante wo aise he krte rhe uthne k baad surya ko namskaar kiya aur chl diye mene Aaakhir puch he liya k aap kb se Dhyaaan kr rhe hai wo bole k 3 saal se mene kaha aise jesa aaj kiya bole haaan mene puch kya kya anubhav rhe dhyaan k koi anubhuti hui.Bata nai paaye batate kese Dhyaan mudra me bethe aadhe gante dhyaan kiya aur 10 baar to hile. urja ka circle jese he create hota fir tut jata fir create hota fir tut jaata 3 saal aise he kiya to aise karne se to 10saal dhyaan kro kuch nai haasil hoga. Ek lady ko aur dekhta hu me park me Dhyaan krte hue same wo bhi 2 mint aankh band agle mint aankh khuli. Bheetar ki yaatra krni to aankhe to band rakhni padegi. aaab kuch log jab tk dhyaan kiya tb tk to theek mgr uske baad fir apne tarike se. kehne kaa matlb kuch to badlaaw laane honge. Jinko kuch nai mil rha hai wo ye log hai jo aise dhyaan krte hai aur saalo tk karte rhenge to bhi kuch nai milega.

      Aadmi aadha ghanta washroom me newpaper leke padta rehta hai. fir aadha ghanta pooja paath krta hai. Tv dekhne me movies dekhne me to time lagata hai.mgr jab Dhyaan ki baari aati hai to sochta hai yaar time to hai nai karunga kb. 🙂 time to nikaalna padta hai.

      And question no. 2~ Is being unrealised/disenlightened and dying like that only so bad?

      Ans : Chaliye sidhi sidhi bhaasha me samjhata hu.Insaan jb paida hota hai bada hota fir apni zaruto ko puri karne ke liye life ko better banane k liye kaam karta hai naukri to kahi bhi miljayegi theli lagalo. Mgr nai wo apne bhawisya ko sudharna chahta hai aur better se better banana chahta hai. isliye achi padai krta hai achi post dekhta hai.Aab aapke paas andriod mobile hoga kyu kaam to normal mobile bhi krta hai. Mgr hum better se better apne aap ko banana chahte hai. warna kewal pet bhrne ki baat ho ko road k kinaare sone wale bhi 2 waqt ka kama kr pet bharke wahi sojate hai dikkat kya mgr dikkat hai aab wo unta he sochte hai aur krte hai isliye wo shayd whi rehjayenge aur marr jayenge. Lekin apni life ko behtar krne wala kuch kaam krega tarkee ki krega taaki jivan me sudhaaye paida kr sake.Aaap apne is sareer k liye itna kuch krte ho.Lekin jo ander jivaatma hai uske behtar k liye kuch nai krte to jab wo mrta hai to wahi road pr pade garib vykti k saaman hai jo jivan bhrr suviha nai juta paata.Aur is jivan mitru k chaakr me pada rehta hai. Aapne janam liya bade hue fir padai ki shaadi ki bacche kiye budde hue fir ek din marr gye. Aaab fir kahi to janam loge fir se whi kiya paida hue bade hue fir marr gye. fir janam leliya to ye circle chlta he rhaa aur chlta hee rhega.Mgr hum log aise he krte aarhe hai.Aapni jivaatma par dhyaan nai dete aur yhi ghumte rehte hai. ek kaam ko hazzaro saalo se krte rehte hai. aab aapse kahu k apne ghr k 100 round lagao aaap kahoge k paagal hu kyaa me jo aisa krunga mgr apne jivaatma ko haazzaro round lagwa rhe ho. Apne us jivaatma k liye bhi kuch kro. Aur Dhyaan he ek matr raasta hai jiske dwara is circle se mukti paayi jaa sakti hai.Agr moksh na bhi milaa to koi nai mgr aapki aatma phele se behtar zarur hojayegi ye samjh liziye k Dhyaan se aap apne aur apni jivaatma ko behtar se behtar baana sakte ho.

      Jo Dhyaan nai krta aur mar jaata hai to dikkat kya hai fir se lagao round. aur haazaro saal lagaye hai croro lagao yhi frak padega bus.

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  47. Namrta Pandey said,

    March 3, 2017 at 12:00 pm

    sir
    reply plz

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  48. Ajay Solanki said,

    March 14, 2017 at 9:02 am

    Great

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  49. Namrta Pandey said,

    March 18, 2017 at 11:14 am

    Thank you sir.
    try krke fir conform krte h

    Like

  50. Nitin said,

    March 28, 2017 at 4:48 am

    सर
    पूर्ण मुक्त अवस्था क्या होती है जब व्यक्ती पूर्ण मुक्त होता है तो किस अवस्था को प्राप्त होता है कृपया बताने कि कृपा करे

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  51. Nitin said,

    March 28, 2017 at 5:00 am

    ओशो या अन्य सान्तो ने या आपने जब पूर्ण अवस्था प्राप्त कि तो उस अवस्था मे क्या पाया आपने वहा के बारे मे अपना वर्णन बता दीजिये और पूर्ण मुक्त अवस्था मे जो लोक प्राप्त होता है उसकी प्राकृतिक रचना किस तरह होती है ये भी बाताने कि कृपा करे

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    • Nitin said,

      March 30, 2017 at 9:59 am

      कृपया रिप्लाय दीजिये

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      • March 31, 2017 at 3:17 am

        Nitin ji blog padne ke liye Dhnywaad aur ye sawaal puchne k liye bhi Dhnywaad. Dekhiye me main koi Guru nahi hu aur na he osho ki tarh poorn awastha ko prapt nahi hua hu. Mgr Aapke sawaal ka jaawaab jitna hosake uchit dene ki kosis karunga. AAp jannna chahte hai k poorn mukt awastha kya hoti hai. Batana chahunga k ye wo anubhav hai jise bataya nai jaasakta. sabka apna anubhav alag alag hota hai. Aur AAp kehte hai k ek alg duniya prapt hoti hai yaani mukt vykti ko alg lok dikhta hai to mera is baare me koi anubhav nai. haan ek ladies mere pass aayi thi k unko wo lok dikhaai diyaa. jisme tarh tarh k phool, alg hee tarh ki nadiyaa paani aur tarh trah ki khussbhu aisa bht kuch uhne dikhai diyaa. aab ek vykti aur aaye k muje aisa lag k andhere me ghusse jaa rha hu sainik sipaahi khade hue hai phaad hai bade bade ruk hee nai rha hu. bade bade gate hai. to unka apna ye anubhav hai. aab sabke apne anubhav hai kya pata aapka anubhav kyaa rhe aab ye Dhyaan k baad jab ye awaasta aayegi tbhi pata chalega k kaunse lok me aap jaate ho. Accha hoga k khud karke hee jaano.

        Like

  52. Nitin said,

    March 31, 2017 at 10:28 am

    धन्यवाद

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  53. sanju singh said,

    April 14, 2017 at 2:41 am

    Kya dhyan beech mai chodne ke baad suru kiya ja sakta hai.

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    • April 17, 2017 at 2:36 am

      me aapka sawaal nahi samjha chodne k baad matlb Dhyaan to aap jab marzi kar sakte ho mgr kosiss karo ki kum kisi karan hojaye mgr continue krte rhe tabhi result ayega.

      Like

  54. sanju singh said,

    April 16, 2017 at 11:06 pm

    Reply pls.

    Like

  55. Vikash kumar singh said,

    May 12, 2017 at 1:21 am

    Jab main dhyan karte hoon to dhyan karte hue us stage per jata hoon jab saans ka kendra gayab ho jata hai.Pata hi nahi chalta hai ki saans le raha hoon ya nahi.kabhi kabhi lagta hai ki dono bhohon ke bich Sar Sarahat hoti hai.kabhi anubhav hota hai ki bhurukuti se saans chal rahi hai, lekin jaise hi Chetana jag rat hoti hai bhurukuti se saans gayab ho jati hai. Kafi Dino se isi ke bich jhool raha hoon.
    Is ke aage Ja hi nahi Pata hoon.is ke a age kya karna hai agar aap marg darshan kar saken to aap ki bari meharbani hogi.
    Mob 7903513344.7759810905.my self vikash Singh.

    Like

    • Vikash kumar singh said,

      May 15, 2017 at 12:50 am

      Kya baat hai bhai koi response nahi mil raha hai.

      Like

  56. Vikash kumar singh said,

    May 12, 2017 at 1:34 am

    Jai guru dev
    Bahut bar aisa ho chuka hai ki dhayanavastha me kabhi haath to kabhi pair uper utha hua hai Chetana jagrat hote hi dharam se niche gir jata hai.kabhi kabhi sirf kamar uper uth jata hai.
    Thanks
    Vikash

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  57. hanuman dhayal said,

    May 18, 2017 at 5:38 am

    sir,
    me pichle 50 dino se osho guruji ko sun RHA hu unke the anusar dhyan kr RHA hu. 5-6 din third eye pr dhyan dene ke bad vha poore din/ jb bhi mujhe iska khyal aata h , kuch chintiyan chalne jesa mahsoos hota rhta h. kisi or kendra pr dhyan ki kosis krne pr bhi yh bmuskil rukta h. yh kya h iske bare me btayen
    or
    rid ki hddi me niche ki trph kmr ke pas kuch grmi so mahsoos hoti h , kbhi kbhi muladhar ke aas paas boht tej dbav mahssos hota h . yh kya h kripya btaye.

    Like

    • June 2, 2017 at 5:37 am

      Mene ek link bheja hai dear sabko aab aap mere sath easy jud sakte hai mene ek group create kiya hai jiska link post me aap dekh sakte hai. Dhyaan se related aapki problems share kar sakte hai. Dhnywaad.

      Like

  58. चेतन गुप्ता said,

    May 26, 2017 at 11:53 pm

    वस्तव में आपके दुबारा दी गयी सुचना बहुत महतबपूर्ण है।

    आपका बहुत बहुत धन्यबाद।

    Like

    • June 2, 2017 at 5:38 am

      Mene ek link bheja hai dear sabko aab aap mere sath easy jud sakte hai mene ek group create kiya hai jiska link post me aap dekh sakte hai. Dhyaan se related aapki problems share kar sakte hai. Dhnywaad.

      Like

      • Baldev Sadhu said,

        June 30, 2017 at 1:45 am

        Guruji namaskar, Muje Dhyan Meditation mein Prakash aur Suksama Aawaz ka anubhav hua. Mera ek question hai ki Mein thode mahino se Asman main har taraf harbsr udata Ek Beautiful Chhota Circle ke sath sath 5-10 joint circle bhi Ankho se clean dikhata hai. To yah anubhav kayu ho raha hai, aur ish ka naam kaya hai. Abhi to Shir-Dard problem bhi chalu ho gaya hai, solution batavoji. Do mahino se Adbhut Anand ke sath sath thodi shirdard ki pareshani hai. My heartly request for best Solution

        Like

      • July 17, 2017 at 4:46 am

        https://chat.whatsapp.com/5oZ8xN4iPiHAM4UtlOrLA7 is group ko join kijiye hum yha available rehte hai aur aapke parshno k jawab bhi aapko yhi miljayenge

        Like

  59. चेतन गुप्ता said,

    May 26, 2017 at 11:54 pm

    आपका बहुत बहुत धन्यबाद।

    Like

  60. Baldev Sadhu said,

    June 30, 2017 at 2:31 am

    Pranam, Dhyan mein Prakash aur Sukshma awaz suni. Mera question hai ki Muje last two month se Asman (sky) mein harbar udta ek Chhota Circle aur sath sath 5-10 joint circles Ankho se samne har pal dikhta hai. To yah adbhut beautiful circle kaya hai. Aur kayu dikhata hai, muje thoda ajib sa lagata hai. ShirDard bhi rahata hai. Request for proper guide & solution. Mobile. 9377191896 Baldev, Ahmedabad

    Like

  61. Yogesh Babubhai Patel said,

    July 1, 2017 at 7:16 pm

    Mein rose maalaa japta hu aur 5 min dhyaan karta hu par kabhi kabhi boddy par kuch kuch chakra gumta aur dhyaan se man ruk jata hai to chkra bhi ruk jata hai is ka kyaa matlab hai

    Like

  62. Baljit said,

    July 25, 2017 at 6:32 am

    Guru ji muje bhi dhyan k samay jhatke masoos hote aur parkas ka anubhav hota aur sarir pr chitti jaisi chlti cheez masoos hoti h ye sab kya h Guru ji

    Like

  63. J.k . Panday said,

    September 5, 2017 at 11:08 am

    Very nice information

    Like

  64. pooja said,

    September 8, 2017 at 12:27 am

    too good

    Like

  65. November 6, 2017 at 5:49 pm

    Good

    Like

    • November 13, 2017 at 2:21 am

      Hello Friends.
      I have whtsapp group for meditation. If you want to know about meditation or want to do meditation. or Want to share your experience. I will add you on that group. Interested people

      Contact me : 99990493010

      Like


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