ध्यान करने से होता क्‍या है?

यह क्रिया आपके और आपके शरीर, आपके और आपके मन के बीच एक दूरी बनाती है। आप जीवन में जूझ इसलिए रहे हैं, क्योंकि आपने इन सीमित रूपों के साथ अपनी पहचान बना ली है। ध्यान की खासियत यह है कि आप और जिसे आप अपना ‘मन’ कहते हैं, उनके बीच एक दूरी बन जाती है। आप जिस भी पीड़ा से गुजरते हैं, वह आपके दिमाग की रचना है; क्या ऐसा नहीं है? अगर आप खुद को दिमाग से दूर कर लेते हैं, क्या आपके भीतर पीड़ा हो सकती है? यहीं पीड़ा का अंत हो जाता है।

जब आप ध्यान करते हैं, आपके और आपके दिमाग के बीच एक दूरी पैदा हो जाती है, और आप शांतिपूर्ण महसूस करने लगते हैं। पर समस्या यह है कि जैसे ही आप अपनी आँखें खोलते हैं, आप फिर से अपने दिमाग के साथ उलझ जाते हैं। अगर आप रोज ध्यान करेंगे, एक दिन ऐसा आएगा जब आप अपनी आँखे खोलेंगे और तब भी आप अनुभव करेंगे कि आपका दिमाग वहाँ है और आप यहाँ हैं। यह तकलीफों का अंत है। जब आप अपने शरीर और अपने मन के साथ अपनी पहचान बनाना बंद कर देते हैं, आप अपने भीतर सृष्टि के स्रोत से जुड़ जाते हैं। जैसे ही ऐसा होता है, आपके ऊपर कृपा होती है।

चाहे आप कहीं रहें, यहाँ या किसी दूसरे लोक में, अब तकलीफों का अंत हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि अपने कर्मों की पूरी गठरी – अपने अतीत और अचेतन मन – को किनारे कर दिया है। आपके ऊपर इनका कोई असर नहीं होता। जैसे ही पीछले कर्मों का आपके ऊपर असर समाप्त हो जाता है, तब जीवन एक विशाल संभावना बन जाता है।

हर साँस आपके जीवन में एक महत्वपूर्ण संभावना बन जाती है, क्योंकि अब आपके वजूद पर आपके अतीत का कोई असर नहीं होता। जब आप यहाँ बैठते हैं, आप भरपूर जीवन होते हैं। जिंदगी सहज हो जाती है।

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